तुमसे जो कहना था
कभी नहीं कहा .
तुमसे जो सुनना चाहा
वो तुमने नहीं कहा .
रिश्ता....हमारा
कोमल एहसासों की
नरम गर्माहट में बस ऐसे ही
पलता रहा...बढ़ता रहा .
तुम अपनी आशंकाओं में घिरे रहे
मुझे दुविधाओं से फुर्सत न मिली
नतीजा उसका यह हुआ
कि हम....
दूर हुए ..मजबूर हुए
अलग-अलग ज़िंदगी जीने को..
आसानी से हमारा संग-साथ
मुमकिन हो सकता था
आज जो सबसे बड़ा दुःख है
वो सबसे बड़ा सुख हो सकता था .
वो चाहते रहना और कह न पाना
सोचने बैठूं ...
तो मलाल सा होने लगता है
खुद पे और तुमपे भी गुस्सा आता है .
सामने हाथ बढाने की देर थी
तू मेरा हो सकता था .
ज़रा सी कोशिश,थोड़ी सी हिम्मत से
सब बदल सकता था.
पता है....इसीलिए अब
जब भी ख़्वाब आते हैं
उनमें भी हम एक दूजे को नहीं पाते हैं
वो सारे सपने भी अपने साथ
सिर्फ ढेर से उलाहने लाते हैं .
जो हाथ मेन होता है उससे किसी को कहाँ तसल्ली होती है .... दूर के ढ़ोल सुहावने लगते हैं ... दुविधा से निकल आज को जी लें
ReplyDeleteजो हाथ में रहा हो और छूट गया हो...उसका क्या .खैर,एक भाव है..बस.
Deleteजीना तो है ही ..खुश भी रहना ही है.
उलाहना देने में ही वक्त गुजर गया..
ReplyDeleteऔर जो अपना हो सकता था वो
एकदम से पराया हो गया...
एकदम सच्ची बात..
:-)
जहां कोई और है वहाँ वो हो सकता था....हैं ना ?
Deleteसामने हाथ बढाने की देर थी
ReplyDeleteतू मेरा हो सकता था .
ज़रा सी कोशिश,थोड़ी सी हिम्मत से
सब बदल सकता था.
....सच, लेकिन अब पीछे मुड़कर देखने से क्या फायदा...बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..
पीछे मुड के देखना भी नहीं चाहिए....हमेशा आगे देखना चाहिए.
Deleteपसंद करने के लिए,धन्यवाद!
:)) ....बस और कुछ नहीं ...
ReplyDeleteआज जो सबसे बड़ा दुःख है
वो सबसे बड़ा सुख हो सकता था ....
कुछ अपनापन सा लगा इन पंक्तियों में ..
:-))
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