Sunday, September 9, 2012

न जाने कहाँ गयी ....




जेठ की तपती दुपहरी
गरम साँसों की आवाजाही
लू भी जब जी जला रही
तब...एकाएक
उसने कहा कि
वो दूर जाने वाला है
कुछ दिन का विरह
बीच में आने वाला है .

मैंने कहा,बता कर जाना
उसका कहना कि
मुझसे कहे बिना क्या
संभव होगा उसका जा पाना ?

वो गया ...
जब चला गया...
दुनिया ने बताया .
जब लौटा ..तब भी....
जग ने ही खबर दी,
उसकी वापसी की .
बताने की ज़रूरत उसे
महसूस ही नहीं हुई .
उसकी ज़िंदगी वैसे ही
मेरे बिन भी चलती रही .

बड़े दिन बाद
एक दिन बात हुई
शिकवे हुए शिकायत हुई
पर,
उसकी आवाज़ की ठंडक
कलेजे के खून को जमा गयी
आषाढ़ के महीने में भी
रिश्तों में से गर्माहट
न जाने कहाँ गयी .

17 comments:

  1. रिश्तों के भटकाव अक्सर जेठ में भी ठंडक का एहसास कराते हैं ...
    इस गर्मी के बने रहने में ही अच्छा है ...

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    1. गर्माहट बने रहना ज़रूरी है

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  2. कभी कभी बिना जाने रिश्तों की गर्माहट खत्म हो जाती है ... सुंदर प्रस्तुति

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    1. ठण्ड कब दबे पाँव आकर पैर पसार लेती है....पता ही नहीं चलता

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  3. किसी अपने की रुसवाई
    रिश्ते की गर्माहट को ख़त्म कर देती है..
    भावपूर्ण....
    :-)

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  4. आह !...शब्दों की खूबसूरती से लिखे गए अहसास

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    1. तहे दिल से शुक्रिया...उत्साहवर्धन के लिए

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  5. उसकी आवाज़ की ठंडक
    कलेजे के खून को जमा गयी
    आषाढ़ के महीने में भी
    रिश्तों में से गर्माहट
    न जाने कहाँ गयी . .. लौट भी आए तो क्या वो गर्माहट होगी

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  6. आज भागदौड़ की जिंदगी में बहुत कुछ बदल रहा है..बस सब ऐसे ही है...प्रभावशाली कविता..सुन्दर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

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    1. पसंद करने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

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  7. खूबसूरती से लिखे अहसास
    खूबसूरत कविता जो मन को छू गई....!!!!

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  8. भावपूर्ण रचना......और इतने गहन भाव को शब्द देना .......आपकी विलक्षणता को दर्शाता है।

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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