तुम देखना
अबकि बार
जब बस ज़रा धीमे होगी....
उस मोड पर ....
एक पेड है ..बड़ा पुराना सा..
मैंने बांधी है उसपे
अपनी सितारों टंकी
तेरे प्यार सी सुर्ख चुन्नी
कि ...तुम लौट आओगे
शहर में नहीं रम जाओगे .
देखो......कब आओगे???
मन्नत पूरी होती है...होगी
सबके इस यकीं को
कायम रखने के लिए .
वैसे ,उसी मोड पे ....
मैंने देखा है कि
सारे के सारे मवेशी तक
अपना रास्ता भूल जाते हैं.
वाह .. मासूम ही चाहत लिए ...
ReplyDeleteवो न आयें ऐसा हो नहीं सकता ... वैसे भी शहर में बस पत्थर ही होते हैं ... दिल तो उनके साथ ही होता है ...
चाहतों की यह मासूमियत कायम रहे...बस मन्नतें पूरी हो जाएँ.
Deleteaas bandhi rahe ...
ReplyDeletesundar abhivyakti ...
जी हाँ,उम्मीद कभी नहीं छोडनी चाहिए.
Deleteकुछ ना कह के भी सब कुछ कह डालती है आपकी कविता
ReplyDeleteसंजय जी.....प्रशंसा हेतु,धन्यवाद!
Deleteबस मन्नतें पूरी हो जाएँ !
ReplyDeleteआमीन!
Deleteउस मोड़ पे
ReplyDeleteसितारों टंकी चुन्नी नहीं
हसरतें बांधी हैं
अबकी बार
जब बस ज़रा धीमे होगी
उस मोड पर
नज़र भर देख लेना
मेरी हसरतों को भी
तुम्हारे ख्वाबों से कमतर सही
पर उम्मीदों की
असंख्य डोरियाँ हैं उनमें
हर बार भी काटोगे एक डोर
तो भी बच रहेंगी
काफी है यही
मेरे जीने भर को ...
मैंने
आँखों के इंतज़ार को भी
कंदील बना
टांग रखा है एक शाख पर
रोशन तो नहीं वो
तुम्हारे शहर जितनी
पर उसकी टिमटिमाती लौ
जीवन देती है मुझे
तूलिका ............
Deleteजो हसरतें बांधी हैं न,तुमने
अब उनको
एक -एक कर टूटते देखना
सहेजना उनका दर्द
अपने भीतर ..
समेटना उनको
और बिखरना खुद .
अनगिनत बार की गयी
टूटने के बाद जुड़ने की कोशिशें
एक दिन ....तुम्हें दरारों से भर देंगी.
सहना उस तकलीफ को ,अकेले
क्यूंकि कुछ अनकहे दर्द
जीने का सामान हो जाते हैं .
यूँ भी पीड़ा की आदत हो जाए तो
उसके बिना जीवन जीवन सा नहीं लगता .
अच्छी रचना
ReplyDeleteशुक्रिया!!
Deleteप्रभावी रचना ... लाजवाब
ReplyDeleteइंतज़ार और बस इंतज़ार
ReplyDeleteहम्म...प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा
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