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Friday, August 31, 2012

राहे इश्क में पहला क़दम....



ग़मों से दोस्ती का मैं दम रखती हूँ
राहे इश्क में पहला क़दम रखती हूँ

खुदा की नेमत सी लगे है ये दुनिया
यही सोचकर शिकायत कम रखती हूँ

बिछड के सूख न जाए प्यार की बेल
आज तलक तेरी यादें नम रखती हूँ

किसी एक दिन तुम हो जाओगे मेरे
दिल के कोने में ये भरम रखती हूँ

लोगों को चाहिए मौक़ा हँसने का
इसी से छिपा के अपने गम रखती हूँ"

Wednesday, July 11, 2012

कमबख्त प्यार




वो जो एक अजीब सी बेचैनी है न
इस कमबख्त प्यार में
जो न कायदे से जीने देती है न मरने....
वही शायद रास आती है,मुझे
लगता है कुछ अटक सा गया है हलक में
जो यह निकला तो जान लेकर निकलेगा .
इसी जीने मरने के बीच की कवायद में
मेरा इश्क से इश्क गहराता जाता है
गले में कोई फंदा सा है
जो कसता चला जाता है .

मज़े की बात यह है
कि जब ऐसा नहीं होता
तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता.

Wednesday, June 20, 2012

मूड अनुसार



मेरा मन होता है कि
तुमसे मिलने का ,इश्क करने का
यह फैसला,
हम दोनों ...
अपने घर की दीवार पे टंगे
इस कैलेण्डर को देख कर
न तय करें .
महीना,तारीख ,मौसम
ये कौन हैं हमारे बीच में आने वाले .
तेरा मेरा मिलना...
"हम"तय करेंगे
अपने मूड के अनुसार .
डायरियां ,कैलेण्डर जैसी चीज़ों को
अपने से परे रख कर .

आओ ना..
तुमसे मिलने का मन है
आज तुम्हें प्यार करने को
जी चाहता है ...बहुत .

(प्रकाशित)

Wednesday, May 16, 2012

प्रेम से खूबसूरत कुछ......नाह रे.



प्रेम को जब तक देखते हैं
दूर से ...
बहुत खूबसूरत और प्यारा लगता है ..हैं न ?!
जब यह घटित हो जाता है
अपने जीवन में
तब, समझ आता है कि
क्यूँ लोग कहते थे ...
किसी को बद्दुआ देनी हो तो कह दो
उसे इश्क हो जाए.
कितनी मुश्किल है हर राह ,हर गली इसकी
कितने दर्द हैं और कितने आंसू.?
कितनी यादें हैं न जाने कितनी फरियादें हैं..
अच्छा कुछ नहीं है क्या, इसमें?

तुमने पहले ही पूछ लिया
वो...जो मैं कहने जा रही थी
कितनी भी परेशानियां हो
या कितनी भी तकलीफें
जिसको एक बार हुआ
वो कहेगा यही....
इससे खूबसूरत दुनिया में
सच्ची कुछ भी नहीं...
सच्ची-मुच्ची ....कसम से.

Wednesday, February 15, 2012

चक्रव्यूह




मेरा दिमाग आजकल दिल पे खूब बिगडता है ..
कहता है..मना करता है ...समझाता है
पुरजोर कोशिश करता है
कि
मैं इस जी के जंजाल में ना पडूँ .
इक बार फंसी तो निकल नहीं पाउंगी
चक्रव्यूह है ये ,अन्दर ही रह जाउंगी

मैं क्या करूँ ..
हैरान हूँ ...मैं अपनी इस हालत पे
कुछ खींच रहा है मुझे अपनी ओर
बस ही नहीं चल रहा ,मेरा....खुद पे
किसी और के हाथ में हो गयी है मेरी डोर.


दिल उतरता जाता है,डूबता जाता है
इश्क के इस दरिया में...
दिमाग अलग खडा मुस्कुराता जाता है ...
मैंने तो मना किया था
अब तुम जानो....तुम्हारा खुदा जाने
कि तुम डूबे ,मरे या पार हुए.

Thursday, February 9, 2012

कमबख्त इश्क


मुझे जब से इश्क हुआ है
मैं भी ढूंढ रही हूँ
एक ऐसी घडी
एक ऐसा कैलेंडर
जो मुझे सही वक्त .....तारीख ...महीना ...साल बता दे
सब कुछ उलट पुलट है
अस्त व्यस्त है
जब से ये कमबख्त इश्क आया है जीवन में....
तुम्हें कुछ पता चले...
तो मुझे भी बताना
दिन ,महीने, साल के बारे में ....

Saturday, October 22, 2011

कारण -कार्य सम्बन्ध


आज तलक़ मैंने यही सुना और पढ़ा
कि हरेक कार्य का कोई कारण होता है
जैसे बिन आग धुंआ नहीं होता
वैसे कोई काम बिन कारण नहीं होता
पर,
आज हुआ है प्यार
सोचती हूँ ,कि
क्या...........
हर पे लागू किया जा सकता है ये सिद्धांत
कैसे हर चीज़ के पीछे वही एक बात .??/

यहाँ "नहीं"....लागू होती ,यही उत्तर मन में आता है
दार्शनिक,वैज्ञानिक इन सबने....
दिल में लगी आग को नहीं देखा
देखा होता तो बता पाते धुंआ कहाँ हैं
सब देखा ...सब जाना ...आगे पीछे ,ऊपर नीचे,अंदर बाहर
बस इन्होने प्यार ही नहीं समझा...जाना .

अच्छा लगने के पीछे कारण ढूंढना
प्यार होने के एहसास को महसूस करते
यह सोचना कि क्यूँ हुआ ,कैसे हुआ
है प्यार को ही नीचे गिराना
एक उत्कृष्ट भावना का पोस्टमार्टम करना

मुझे जबसे इश्क हुआ
मैंने जाना कि कारण-कार्य संबध..
यहाँ ...लागू नहीं होता
बाकी भौतिक जगत आता होगा इसकी सीमा में
पर अनुभूतियों को नहीं बाँधा जा सकता इसकी परिधि में
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर देने में
मेरा सारा पढ़ा हुआ चुक जाता है
समस्त जीवन का दर्शन और विज्ञान ,
अंततः........
प्रेम के समक्ष धरा रह जाता है

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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