ग़मों से दोस्ती का मैं दम रखती हूँ
राहे इश्क में पहला क़दम रखती हूँ
खुदा की नेमत सी लगे है ये दुनिया
यही सोचकर शिकायत कम रखती हूँ
बिछड के सूख न जाए प्यार की बेल
आज तलक तेरी यादें नम रखती हूँ
किसी एक दिन तुम हो जाओगे मेरे
दिल के कोने में ये भरम रखती हूँ
लोगों को चाहिए मौक़ा हँसने का
इसी से छिपा के अपने गम रखती हूँ"
लोगों को चाहिए मौक़ा हँसने का
ReplyDeleteइसी से छिपा के अपने गम रखती हूँ"
sarthak ...sashakt ...sundar abhivyakti ...
shubhkamnayen ...
अनुपमा....प्रशंसा हेतु,आभार!
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ReplyDeleteकिसी एक दिन तुम हो जाओगे मेरे
दिल के कोने में ये भरम रखती हूँ ... इक इक सांस इसी ऐतबार पे लेती हूँ
जी सही कहा,आपने.
Deleteइन पंक्तियों में शायद एक ही बात सत्य है.....की यह 'भ्रम' है.
Deleteअगर यह भ्रम नहीं होता तो शायद यह शब्द भी नहीं होते निधि. नहीं जानती की क्या दुआ करूँ की यह भ्रम सच हो जाये या फिर ताउम्र बना रहे ताकि इसके दर्द से शब्द रोशन हो. जो भी हो, तुम्हारे साथ बहुत अच्छा हो, सिर्फ यही प्रार्थना कर सकती हूँ.
भरम टूटने के लिए ही होते हैं शेफाली पर जब तक हो इन्हें पाले रहना अच्छा लगता है.मनाओ ये भ्रम बना रहे,टूटे नहीं क्यूंकि सच होना संभव नहीं है .तुम्हारी प्रार्थना में मैं अगर जगह पायी हूँ तो इसे मैं अपनी उपलब्धि कहूँगी
Deleteआमीन....
Delete:-)
बहुत सुन्दर...
ReplyDeleteकोमल सी गज़ल....
अनु
साथ बने रहने के लिए,शुक्रिया!
Deleteखुदा की नेमत सी लगे है ये दुनिया
ReplyDeleteयही सोचकर शिकायत कम रखती हूँ
waah!!
थैंक्स!
Deleteलोगों को चाहिए मौक़ा हँसने का
ReplyDeleteइसी से छिपा के अपने गम रखती हूँ
बेहतरीन ग़ज़ल...उम्दा!!!
शुक्रिया,पसंद करने के लिए.
Deleteअच्छी गज़ल.. 'रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय' को आपने मक्ते में बहुत खूबसूरती से पेश किया है!!
ReplyDeleteसटीक दोहे का उद्धरण दिया ,आपने.
Deleteप्रभावशाली अभिव्यक्ति है आपकी शैली में ...
ReplyDeleteबधाई डॉ .
धन्यवाद!!
Deleteबहुत भावप्रणव अभिव्यक्ति!
ReplyDeleteतहे दिल से शुक्रिया !
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