Friday, August 31, 2012

राहे इश्क में पहला क़दम....



ग़मों से दोस्ती का मैं दम रखती हूँ
राहे इश्क में पहला क़दम रखती हूँ

खुदा की नेमत सी लगे है ये दुनिया
यही सोचकर शिकायत कम रखती हूँ

बिछड के सूख न जाए प्यार की बेल
आज तलक तेरी यादें नम रखती हूँ

किसी एक दिन तुम हो जाओगे मेरे
दिल के कोने में ये भरम रखती हूँ

लोगों को चाहिए मौक़ा हँसने का
इसी से छिपा के अपने गम रखती हूँ"

20 comments:

  1. लोगों को चाहिए मौक़ा हँसने का
    इसी से छिपा के अपने गम रखती हूँ"
    sarthak ...sashakt ...sundar abhivyakti ...
    shubhkamnayen ...

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    1. अनुपमा....प्रशंसा हेतु,आभार!

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  2. किसी एक दिन तुम हो जाओगे मेरे
    दिल के कोने में ये भरम रखती हूँ ... इक इक सांस इसी ऐतबार पे लेती हूँ

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    1. जी सही कहा,आपने.

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    2. इन पंक्तियों में शायद एक ही बात सत्य है.....की यह 'भ्रम' है.
      अगर यह भ्रम नहीं होता तो शायद यह शब्द भी नहीं होते निधि. नहीं जानती की क्या दुआ करूँ की यह भ्रम सच हो जाये या फिर ताउम्र बना रहे ताकि इसके दर्द से शब्द रोशन हो. जो भी हो, तुम्हारे साथ बहुत अच्छा हो, सिर्फ यही प्रार्थना कर सकती हूँ.

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    3. भरम टूटने के लिए ही होते हैं शेफाली पर जब तक हो इन्हें पाले रहना अच्छा लगता है.मनाओ ये भ्रम बना रहे,टूटे नहीं क्यूंकि सच होना संभव नहीं है .तुम्हारी प्रार्थना में मैं अगर जगह पायी हूँ तो इसे मैं अपनी उपलब्धि कहूँगी

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  3. बहुत सुन्दर...
    कोमल सी गज़ल....

    अनु

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    1. साथ बने रहने के लिए,शुक्रिया!

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  4. खुदा की नेमत सी लगे है ये दुनिया
    यही सोचकर शिकायत कम रखती हूँ

    waah!!

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  5. लोगों को चाहिए मौक़ा हँसने का
    इसी से छिपा के अपने गम रखती हूँ

    बेहतरीन ग़ज़ल...उम्दा!!!

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    1. शुक्रिया,पसंद करने के लिए.

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  6. अच्छी गज़ल.. 'रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय' को आपने मक्ते में बहुत खूबसूरती से पेश किया है!!

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    1. सटीक दोहे का उद्धरण दिया ,आपने.

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  7. प्रभावशाली अभिव्यक्ति है आपकी शैली में ...
    बधाई डॉ .

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  8. बहुत भावप्रणव अभिव्यक्ति!

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    1. तहे दिल से शुक्रिया !

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