क्लास लगी है
वहीं...बरगद के चबूतरे पर
गाँव के दद्दा सिखाएंगे
कि लड़का लड़की प्यार कैसे करेंगे .
मिलते ही...दिल के जुड़ने से पहले
पूछेंगे ...गोत्र,धर्म जाति
फिर अंदाज़ा कि
पैसे से मजबूत है की नाही .
उसके बाद प्यार करना बच्चो
वरना ,फिर सामू और कम्मो
कि तरह मरना बच्चो .
सिखा रहे हैं
पढ़ा रहे हैं पाठ ...
प्यार होना नहीं चाहिए
क्यूंकि
प्यार सब देख भाल कर ...कह सुन कर ...जांच-परख कर
करने वाली चीज़ है.
ऊच-नीच नही लागता,प्यार ये ऐसा खेल
ReplyDeleteबंधन जितना कसोगे , उतना बढ़ता मेल,,,,
लाजबाब प्रस्तुति,,,निधि जी,,,,
RECENT POST...: शहीदों की याद में,,
धीरेन्द्र जी ....सही कहा,आपने.
Deleteप्यार सब देख भाल कर ...
ReplyDeleteकह सुन कर ...
जांच-परख कर...
करने वाली चीज़ है.
.
कुछ चीजें समाज को अपने सच्चे रूप में स्वीकार्य नहीं होती. प्यार उन्हीं में से एक है.
सच..प्यार सा खूबसूरत एहसास क्यूँ लोगों को असह्य है...समझ नहीं आता.
Deleteमेरी टिप्पणियों का प्रिय स्थान स्पैम है.
ReplyDelete:-) अकसर मेरी भी....
Deleteआप दोनों की टिप्पणियों को निकाल कर लाना...मेरा प्रिय काम.
Deleteबहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteक्या कहने
धन्यवाद!!
Deleteबहुत बढ़िया.....
ReplyDeleteतीर की तरह लगी रचना....मगर पंचायत बेअसर!!!!
अनु
थैंक्स!!
Deleteबहुत कम लफ्जों में बहुत गहरी बात कह दी आपने।
ReplyDeleteईद की दिली मुबारकबाद।
............
हर अदा पर निसार हो जाएँ...
शुक्रिया!!
Deleteईद मुबारक हो...!
bauhat accha kataaksh....jo jaanch parakh liya...to pyaar kahan!!
ReplyDeleteवही तो सौम्या
Deleteबूंद-बूंद इतिहास पर नई कविता की प्रवृत्तियां इस विषय पर नई पोस्ट में आप सादर आमंत्रित हैं। -मनोज भारती
ReplyDeleteआती हूँ
Deleteकाश ये प्रेम पढ़ाने वाले अनपढ़ ही रह गये होते....बदनसीब दद्दा...
ReplyDeleteहाँ..सच्ची .
Deleteबेचारे पञ्च , दिल को कैसी जानेंगे !
ReplyDeleteप्यार समझने के लिए प्यार होना ज़रूरी है.
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