Friday, December 9, 2011

परिणत




इतना असहाय क्यूँ कर देता है प्रेम????
इतना परवश कभी नहीं हुई थी,मैं.
अपना कुछ है ही नहीं
मन ,विचार,संवेदना,भावना
सब तुमसे शुरू तुम पे खतम.

जिधर तुम..
उस ओर रही
उस ओर बही .
मैं ..मैं ही नहीं रही
तुझमें ही व्याप्त होकर
तुझमें ही परिणत हो गयी.

33 comments:

  1. बेहतरीन...प्रेम ही प्रेम बस
    खुबसूरत अंदाज़


    www.poeticprakash.com

    ReplyDelete
  2. बिल्‍कुल सच ।

    ReplyDelete
  3. मैं ..मैं ही नहीं रही
    तुझमें ही व्याप्त होकर
    तुझमें ही परिणत हो गयी.

    मन की भावनाओं और कशमकश को सुन्दर शब्द दिए है आपने....अच्छी प्रस्तुति.....निधि जी

    ReplyDelete
  4. करता है विवश ... पर वहीँ से सत्य के रास्ते खुलने लगते हैं ...

    ReplyDelete
  5. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

    ReplyDelete
  6. खूबसूरत..

    ...

    "समर्पण देख तेरा..
    समर्पित हो गयी..
    ह्रदय में बसाते-बसाते..
    तुझमें ही परिणत हो गयी..!!!"


    ...

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर कविता...
    वाकई.... सच्चा प्रेम अंध भक्ति की तरह होता है...
    शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  8. ये प्रेम की पराकाष्ठा है ... असहाय नहीं है ये स्थिति जीवन है यही ...

    ReplyDelete
  9. निधि जी '''
    जब प्रेम सच्चा हो तो सभी संवेदनाएं प्रेमी
    पर समाप्त होजाती है,...बेहतरीन पोस्ट,...
    मेरे पोस्ट में आपका इंतजार है,....

    ReplyDelete
  10. प्रेम में अपना कुछ बचता ही कहाँ है....

    ReplyDelete
  11. बहुत ही खुबसूरत और कोमल भावो की अभिवयक्ति......

    ReplyDelete
  12. bhaut khubsurat se prem ko abhivaykt kiya aapne....

    ReplyDelete
  13. bhaut hi khubsurati se prem ko abhivaykt kiya hai apne...

    ReplyDelete
  14. tabhi to kahte hain....pyar ki nazar se sab kuchh badla nazar aata hai.

    ReplyDelete
  15. प्रकाश..प्रेम जहां पहुँच जाए...वो वस्तु स्वयं सुन्दर हो जाती है

    ReplyDelete
  16. सदा...सच्ची मुच्ची वाला सच

    ReplyDelete
  17. संजय जी....आपको रचना अच्छी लगी...धन्यवाद .

    ReplyDelete
  18. रश्मिप्रभा जी..मैं पूर्णतया आपसे सहमत हूँ.

    ReplyDelete
  19. वंदना...हार्दिक धन्यवाद ,मेरी रचना को शामिल करने हेतु.

    ReplyDelete
  20. प्रियंका...आभार.
    जो तुमने लिखा है न...बस,वही प्यार है .

    ReplyDelete
  21. विद्या...थैंक्स !!प्रेम को बस प्रेम रहने दें.............

    ReplyDelete
  22. महेंद्र जी....थैंक्स!!

    ReplyDelete
  23. दिगंबर जी...सच,प्रेम की पराकाष्ठा है...द्वैत भाव का समापन .परिणत हो जाना

    ReplyDelete
  24. धीरेन्द्र जी....सारी परिधि जब प्रेमी से प्रारंभ हो और वहीँ समाप्त हो जाए ..वही प्रेम है

    ReplyDelete
  25. कुमार...सही कहा ...जब अहम भाव ही शेष न रहे तो कुछ भी अपना कैसे बचेगा ?

    ReplyDelete
  26. सुषमा.....हार्दिक धन्यवाद!!

    ReplyDelete
  27. सागर....पसंद करने के लिए शुक्रिया

    ReplyDelete
  28. अनामिका..प्यार सब बदल देता है...इंसान को,नज़रिए को,नज़र को

    ReplyDelete
  29. अति सुन्दर ....!!

    ReplyDelete
  30. पूनम ....थैंक्स !!

    ReplyDelete
  31. निधि जी ....वाह क्या कहने....!!,इस युग में प्रेम का इस कदर विनम्र समर्पण..? अब ये मत कहियेगा कि प्यार तो प्यार है, इसे कोई और नाम न दो|आपकी समर्पित भावना,आपके बेबाक एवम मौलिक प्रेम की अनवरत धारा को मेरा अभिवादन......!!!!!

    ReplyDelete
  32. शंकर जी....इस खूबसूरत टिप्पणी हेतु धन्यवाद.प्रेम का तो स्वरुप ही यही है...समर्पण करना ,अपना अहम त्याग देना ही तो सिखला देता है ...प्रेम.

    ReplyDelete

टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

Followers