Monday, December 12, 2011

नया हुनर




वक्त.......बड़ा कमबख्त
सरपट दौड़ा जाता है..
आजकल उसके पीछे भाग रही हूँ ..
सारा दिन इसी कोशिश में लगी हूँ ...
कि
वक्त की गिरह से
कुछ लम्हें चुरा लूं .


ऐसे कुछ लम्हे जिनमें
केवल हों ...
"मैं" और "तू".
उन क्षणों में न हो कोई दरमियाँ
जी लें उनमें ....हम सदियाँ .


देखो,समय की जेब क़तर पाती हूँ या नहीं ?
कतरे जो झरेंगे,वो समेट पाती हूँ या नहीं ?
आखिर,कुछ पलों को ...
तेरे साथ को पा लिया
देख न...तेरे प्यार ने
एक नया हुनर सिखा दिया
मुझे खुद नहीं पता चला
कब गिरह्कटी का इल्म आ गया .

29 comments:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  2. वक़्त की गिरह से लम्हें चुराने का प्रयास तो सफल हो गया आपका...
    कोई लम्हा ही तो उतर आया है इस रचना में!
    बधाई:)

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  3. Bahut sundar prastuti...


    Meri kavita :Waqtt kambakht hai....yahan padein (http://www.poeticprakash.com/2011/07/blog-post.html)

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  4. वाह ...बहुत सुन्दर कविता..
    मुझे बेहद पसंद आई..
    आशा है आपके ब्लॉग में अक्सर ऐसा पढ़ने मिलेगा.

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  5. वंदना...थैंक्स!!

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  6. अनुपमा....बड़ी मुश्किल से वक्त की जेब काट पायी...

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  7. प्रकाश...शुक्रिया!!

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  8. विद्या...धन्यवाद.मैं स्वयं भी चाहूंगी कि आपको निराश न करूँ.

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  9. देखो,समय की जेब क़तर पाती हूँ या नहीं ?
    कतरे जो झरेंगे,वो समेट पाती हूँ या नहीं ?
    आखिर,कुछ पलों को ...
    तेरे साथ को पा लिया
    देख न...तेरे प्यार ने
    एक नया हुनर सिखा दिया

    यह पंक्तियाँ विशेष अच्छी लगीं।

    सादर

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  10. यशवंत....शुक्रिया...केवल रचना को पसंद करने के लिए नहीं बल्कि इसलिए कि तुमने यह बताया कि विशेष रूप से क्या अच्छा लगा ...मैं आशा करूंगी कि जब कोई कमी लगेगी तो भी तुम इसी तरह विशेष रूप से उस और इंगित करोगे

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  11. महेंद्र जी...तहे दिल से आपका आभार ...रचना को पसंद करने के लिए.

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  12. वक्त.......बड़ा कमबख्त
    सरपट दौड़ा जाता है..
    आजकल उसके पीछे भाग रही हूँ ..
    सारा दिन इसी कोशिश में लगी हूँ ...

    ...भावनाओं की मखमली चादर में लिपटी रचना.
    शब्दों ने मात्राओं से कहा ""मैं" और "तू".!!"

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  13. संजय जी...बहुत-बहुत शुक्रिया!!

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  14. देखो,समय की जेब क़तर पाती हूँ या नहीं ?
    कतरे जो झरेंगे,वो समेट पाती हूँ या नहीं ?
    आखिर,कुछ पलों को ...
    तेरे साथ को पा लिया
    देख न...तेरे प्यार ने
    एक नया हुनर सिखा दिया
    मुझे खुद नहीं पता चला
    कब गिरह्कटी का इल्म आ गया .

    BAHUT SUNDAR ABHIVYAKTI VAH

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  15. नवीन मणि जी....हार्दिक धन्यवाद...ब्लॉग पर आने,रचना को पढ़ने एवं सराहने हेतु.

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  16. देखो,समय की जेब क़तर पाती हूँ या नहीं ?
    कतरे जो झरेंगे,वो समेट पाती हूँ या नहीं ?...bahut hi khoobsurat chaah

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  17. बहुत सुन्दर और शानदार रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  18. रश्मि जी ....देखिये,कब पूरी हो ,...ये खूबसूरत चाह...

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  19. उर्मी....आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!!

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  20. देख न...तेरे प्यार ने
    एक नया हुनर सिखा दिया
    मुझे खुद नहीं पता चला
    कब गिरह्कटी का इल्म आ गया...aapne behtarin ilm seekh liya..pyaar me girahkati ka maja hee kuch aaur hai..jeewan ke kuch hansi pal kuch hansi yaadein kaphi hian waki ke sare jeewan ke badle..sadar

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  21. आशुतोष जी ...वाकई,प्यार में ....लम्हें,छोटी -छोटी खुशियाँ चुराने का अपना एक अलग ही आनंद है .धन्यवाद ,रचना को पसंद करने के लिए.

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  22. देखो,समय की जेब क़तर पाती हूँ या नहीं ?
    कतरे जो झरेंगे,वो समेट पाती हूँ या नहीं ?
    bahut khoob...

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  23. गिरहकट नहीं हैं हम .....
    लम्हों में प्रेम की सदिया जीने वाले
    दरवेश हैं ...........
    प्रेम को पाँचो इंद्रियों से
    महसूस करते हैं.....
    नसों मे गर्म लहू सा
    दौड़ाते हैं ......
    हृदय मे शोलों सा
    दह्काते हैं.......
    ऐसी गिरहकटी में
    हाथ जलाओ......
    प्रीत लुटाओ ...
    .........तो जाने

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  24. तूलिका ...बात में दम है..खासतौर पे यह दरवेश वाली बात तो कहीं अंदर तक उतर गयी...
    पर,मेरी जान कभी चोरी का आनंद उठाओ तो जानोगी कि जो मज़ा चोरी में है वो दबंगई में नहीं.

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  25. This comment has been removed by the author.

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  26. काट कर जो वो मेरी जेब ले गए, साथ सारे छेद ले गए,
    मुश्किल से छुपाया था मैने वो मेरी ग़ुरबत के भेद ले गए|

    कुछ इंतज़ार करते तो भर देता दामन उनका फूलों से मैं,
    बहार से पहले तोडे फूल वो पतझड़ के चंद पत्ते ले गए|

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  27. राजन.........ह्म्म्म्म्म्म्म!!

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सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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