Monday, August 24, 2015

चुनाव

सारे तरीके
सब हथकंडे
पता थे उसे
कब क्या करे
जो मुझे अच्छा लगे
किस बात को न करे
कि बुरी लगती है मुझे
कैसे मुझे प्यार करे
कब मुझसे नाराज़ रहे
कहाँ दर्द होगा
क्या कहाँ कितना छुपा होगा
किधर चोट लगेगी
कैसे आंसुओं की थमी नदी बहेगी
कब होठों पे हँसी खिलेगी
किस बात पे ख़ुशी छलकेगी

पर,आजकल
वो सिर्फ और सिर्फ
वही करता है जान के
जिससे मुझे खराब लगे।
उन बातों को कहता है
जिससे मेरा जी जले
एक पल चैन न पड़े
उसकी हर बात खले

उसके तरीके उसके से निराले
अजब ढंग हैं प्यार जताने के
अब हैं तो हैं
जो है जैसा है वो
चुनाव तो मेरा है

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (25-08-2015) को "देखता हूँ ज़िंदगी को" (चर्चा अंक-2078) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. इसमें भी तो प्रेम ही है ... जैसे भी हो ...

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