Tuesday, August 25, 2015

अबोला


आजकल तुमसे कह नहीं पाती
दिल की कोई बात
यही वजह सब अनकहा
कागज़ पे ख़ुद चला आता है
मेरे लिखे लफ़्ज़ों में तुम हो
स्याही में घुली हर बात
बहती है खुद को कहती है

पहले तुमसे सब बोल देती थी
रीत जाती थी
अब अंदर ही अंदर घुटती हूँ
भीतर से भरी रहती हूँ
कलम से कागज़ तक का सफ़र
सिर्फ़ तुमसे अपनी कहने का
इक नया तरीका भर है

अबोला...
अच्छा है कई मायनों में
देखो न इसमें भी कुछ न कुछ
पॉज़िटिव ढूंढ लिया मैंने
हर चीज़ में कुछ अच्छा खोजना
तेरी ये बात भूली नहीं अब तक मैं
अब तक तेरी ये बात भूली नहीं मैं।

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (26-08-2015) को "कहीं गुम है कोहिनूर जैसा प्याज" (चर्चा अंक-2079) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत खूब लिखती हैं आप

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