Thursday, August 27, 2015

यायावर

यायावर हूँ
घुमक्कड़ी...काम मेरा
बेमतलब इधर उधर भटकते रहना
बिन काम के यहाँ वहाँ फिरते रहना
तेरे दिल के सिवा न घर न मकाँ मेरा

तुमसे छूटा तो फिर कहीं बंध न सका
ज़िन्दगी में इक ठौर कभी रुक न सका
भागता रहा हमेशा कहीं थम न सका
कोई चीज़ कोई बंधन मुझे कस न सका

प्यार खोया और मैं उसे ढूंढता रह गया
वो ख़त हूँ जिसका पता लापता हो गया
क्या करता यार
तेरे प्यार में पागल हुआ आवारा हो गया
तेरे दिल से निकला तो मैं बंजारा हो गया

4 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.08.2015) को "सोच बनती है हकीक़त"(चर्चा अंक-2081) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. यायावर हूँ भटकता रहता हूँ
    धरा के इस छोर से उस छोर तक।

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  3. प्यार खोया और मैं उसे ढूंढता रह गया
    वो ख़त हूँ जिसका पता लापता हो गया
    क्या करता यार
    तेरे प्यार में पागल हुआ आवारा हो गया
    bahut sundar
    तेरे दिल से निकला तो मैं बंजारा हो गया

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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