Wednesday, August 19, 2015

मोह के धागे

अपनी खुशियों का कारण माना था
सिर्फ तुम्हें मुस्कुराहटों में जाना था
न जाने कब तुमसे जुड़ती चली गयी
तेरे मोह के धागों में बंधती चली गयी
अपना जुड़ना ..जुड़ के बंधना ..
पता था
जो नहीं पता तो वो ये था
कि आखिर तेरे मन में क्या था
तेरी फुरसत का शग़ल भर थी मैं
या दिल में होने वाली हलचल थी मैं

अब तेरी ज़िन्दगी से बेदखल हूँ मैं
वाकिफ हूँ कहीं दाखिल नहीं हूँ मैं
पर  इसके बाद भी उदास नहीं हूँ मैं
आखिरकार सीख ही लिया मैंने
खुशियों को खोजना तेरे बिना भी
नयी जगहों में नये लोगों में
ढूंढ लेती हूँ हंसने की वजह भी

तुमसे लगाव था क्यूंकि
सो वजह मान लिया था
तुमको अपनी ख़ुशी की
फिर सोचा क्यों गिरवी रहे
तेरे पास ......
चाभी मेरी हंसी ख़ुशी की

जुड़ाव के वो धागे
काट रही हूँ धीरे धीरे
जिससे प्यार सिर्फ प्यार रहे
न किसी को साधे न किसी को बांधे
न सधे  न बंधे कभी किसी बंधन में

3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 20 अगस्त 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20 - 08 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2073 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. सुन्दर रचना......

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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