Friday, August 21, 2015

प्यार में पागल

नाराज़ थी तुमसे न जाने कबसे
पर जब बात हुई
कुछ मैंने कही
कुछ तूने कहीं
मेरा कहा कितना सुना पता नहीं
तेरी हर बात सीधी दिल में उतरी
उन बातों को दिल में संजोती रही
उनके साथ जीती रही मरती रही
कहां गया गुस्सा कहाँ गयी नाराज़गी
पता नहीं
तुमने कहा पागल हो क्या
मैं क्यों ऐसा करूंगा भला
बस ...तेरा इतना कहना
और मैंने जिसने सब झेला था
 क्यूं और कैसे  सब भुला दिया
तेरे इस एक पागल हो क्या ने
सब पिछला किया धरा बिसरा दिया
प्यार में पगलाना
इसी को कहते हैं क्या ??

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (22-08-2015) को "बौखलाने से कुछ नहीं होता है" (चर्चा अंक-2075) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete

टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

Followers