Monday, January 2, 2012

तुम्हारे जाने की बात....



तुम्हारे जाने की बात....
पता चली ...कल रात
तबसे यही ख्याल,
बस,यही मलाल
कि....
इतना कम वक्त साथ गुज़ारने को मिला
सब विधाता का ही है ये ... किया धरा

उसमें भी,
कितने पल गंवाएं ..
इन्कार में इज़हार में ..
रूठने में,मनाने में ..

काश.....
उनमें बस प्रेम करते ...
नयी स्मृतियों के बीज रोपते....
पर,मैंने तो सुना है प्रेम में रूठना भी ज़रूरी होता है
बोलो न,
इन ....
रूठने-मनाने के दिन और रातों को
इन्कार इकरार से जुडी सब बातों को
याद रखोगे....क्या????

Saturday, December 31, 2011

नए का स्वागत करो...!!


मैं क्या हूँ...तेरी ज़िंदगी मैं
क्या मायने हैं,मेरे
क्यूँ,मिले हम -तुम
सोच रही हूँ,आज कई दिन से

मैं एक पुराना रिश्ता...
जो नींव बना नए रिश्ते की
मैं...खुश हूँ
कि मैं सेतु बन पायी
जिससे गुजर कर...
तुम पहुँच पाए नयी दुनिया तक
मैं, वो ख्वाब जो पूरा न होकर भी
सितारे छू लेने की, आगे बढ़ने की
हर ख्वाहिश बढ़ा देता है .

पुराने को विदा ...नए का स्वागत ....हैप्पी २०१२

Thursday, December 29, 2011

रोशनी ही रोशनी



तुम....अलग
मैं....अलग.
अलग-अलग होने के बाद भी
कायदे से हम अगर मिल जाएँ...
तो,
विपरीत ध्रुव होने के बाद भी
सही कनेक्शन जुड़ने से
जैसे....
सर्किट पूरा हो जाता है,
बिजली दौडने लगती है.
वैसे ही ..
सब सही हो जता है ...
हमारे बीच.
रोशनी ही रोशनी
मन के अंदर भी ...
और बाहर भी .

Wednesday, December 28, 2011

कुहासे की चादर



कुहासे की इस चादर को...
पर्दा बना लें ,क्या?
जी भर के इन गुलाबी सर्दियों का
मज़ा ले लें,क्या ?

देखो,न
ईश्वर ने भी तुम्हारी सुन ली
तुम्हारी इस हिचकिचाहट
कि कहीं कोई देख न ले ..
..से तुम्हें मुक्ति दे दी

आओ,ना मेरे आगोश में
सच...इस कोहरे को काटने की कैंची
किसी के पास नहीं है ..
जब तक सूरज नहीं आता
भगवान ने ,हमें,
प्यार करने का वक्त दे रखा है

Tuesday, December 27, 2011

जंगल



जंगल....
बिलकुल तुम्हारी आँखों जैसे हैं..
मुझे बुलाते हैं बड़ी शिद्दत से.....
ये अपने करीब.

इनमें जाने का भी मन करता है
डर भी लगता है
कि,
कहीं....
रास्ता ही न भूल जाऊं मैं
ताउम्र ,भटकती ही न रह जाऊं मैं .

Sunday, December 25, 2011

यू एस पी


तुम और मैं
दो विपरीत व्यक्तित्व
तब भी चुम्बक की तरह
एक दूजे की ओर खिंचे चले आये...
क्या सच...विपरीतता ही आकर्षण का कारण बनी
या
मेरी जो कमियां हैं वो तुम पूरी कर देते हो
और तुम्हारा अधूरापन मैं भर देती हूँ ..
एक दूसरे के पूरक हो गए हैं हम.

एक दूजे को ... संपूर्ण कर देना ही ..
हमारे इस रिश्ते की यू एस पी है ..है न?!!

Friday, December 23, 2011

प्रेमांकुर


मेरे मन की
इस बंजर धरा पर ..
प्रेम के अंकुर
फूटे हैं....
पहली बार .
तुम ही कारण हो
इसको बनाने में उर्वरा .
स्नेह रस की वर्षा के बाद
जब-जब चाहत की फसल उगेगी
तुम याद आओगे,बेइंतिहा ....

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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