Saturday, December 15, 2012

साथ-साथ



प्यार करते हो तुम,मुझसे
तुमने अनगिन बार ये
दोहराया है .
मुझमें और तुममें कोई अंतर नहीं
बार-बार यह समझाया है.

पूर्णता के साथ भूलना कैसे संभव है ?
भूलने के लिए भी तो याद करना ज़रूरी है .
कहो,कैसे भूला जाए उस को
जिसने मुझे संपूर्ण किया .

अपूर्ण थी मैं ...
तुमसे मिलके पूर्ण हुई मैं ..
इसलिए ,
विस्मरण जैसा कुछ भी
प्रेम में संभव ही नहीं
तुम मेरा अस्तित्व
मैं तेरा वजूद
इसलिए ....अकेला बिखरता नहीं कोई


जब भी टूटेंगे ...बिखेरेंगे
हम साथ साथ होंगे .

14 comments:

  1. वाह ... बेहतरीन

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  2. प्यार में टूटता-बिखरता सिर्फ एक है ...ऐसा मेरा मानना है :)

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    1. नहीं,हमेशा इअस नहीं होता.कुछ परिस्थितयों में दोनों ही टूटते बिखरते हैं..साथ-साथ

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  3. सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....

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    1. हार्दिक धन्यवाद!!

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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