प्यार करते हो तुम,मुझसे
तुमने अनगिन बार ये
दोहराया है .
मुझमें और तुममें कोई अंतर नहीं
बार-बार यह समझाया है.
पूर्णता के साथ भूलना कैसे संभव है ?
भूलने के लिए भी तो याद करना ज़रूरी है .
कहो,कैसे भूला जाए उस को
जिसने मुझे संपूर्ण किया .
अपूर्ण थी मैं ...
तुमसे मिलके पूर्ण हुई मैं ..
इसलिए ,
विस्मरण जैसा कुछ भी
प्रेम में संभव ही नहीं
तुम मेरा अस्तित्व
मैं तेरा वजूद
इसलिए ....अकेला बिखरता नहीं कोई
जब भी टूटेंगे ...बिखेरेंगे
हम साथ साथ होंगे .
सुन्दर अभिव्यक्ति
ReplyDeleteवाह ... बेहतरीन
ReplyDeleteधन्यवाद!!
Deleteखूबसूरत सोच
ReplyDeleteबहुत उम्दा प्रस्तुति ,,,, बधाई।
ReplyDeleterecent post हमको रखवालो ने लूटा
आभार!!
Deleteप्यार में टूटता-बिखरता सिर्फ एक है ...ऐसा मेरा मानना है :)
ReplyDeleteनहीं,हमेशा इअस नहीं होता.कुछ परिस्थितयों में दोनों ही टूटते बिखरते हैं..साथ-साथ
Deleteसुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद!!
Deleteye khoobsurat sath bna rhe...
ReplyDeleteआमीन!!
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