Tuesday, December 4, 2012

उदासी की रोटी



चलो मिल बैठेंगे
किसी रोज.....

बाँट लेंगे उदासी की यह रोटी
निगल लेंगे इसे
अश्क़ॉ के नमक के साथ.

बांटेंगे अपने ग़म
करेंगे थोड़ी हंसी ठिठोली
यूँ भी ...
कितना वक्त गुज़र गया
माहौल हल्का हुए
अचार के मस्त चटखारे का स्वाद
जुबां भूलने लगी है .

(प्रकाशित)

10 comments:

  1. :( कभी कभी तो रोटी भी मिलना मुश्किल होती है.. अचार और प्याज तो दूर की बात है।

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    1. ह्म्म्म...उदासी की रोटी मिल जाती हैं..कभी किसी से मांग कर देखियेगा,उसकी उदासी

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  2. :):) याद ताज़ा कीजिये अचार की ... उदासी की रोटियाँ तो मिल ही जाएंगी

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    1. जी...बिलकुल.जीवन में सकारात्मक होना बहुत ज़रूरी है.

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  3. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .

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    1. पसंद करने के लिए,आभार.

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  4. बहुत खूबशूरत सुंदर प्रस्तुति

    recent post: बात न करो,

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  5. सच है उदासी को मिल बाँट के बिताया जाय तो कम हो जाती है ...
    शशक्त पंक्तियाँ ...

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    1. जी बिलकुल.बांटने से दुःख कम और खुशियां दुगनी हो जाती हैं

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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