Sunday, December 9, 2012

सच कहना




सच कहना रुकता है क्या ...कुछ
किसी के होने से या न होने से .

कहीं कुछ नहीं थमता
वैसे ही है चलता रहता
अच्छा है जितनी जल्दी
आ जाएँ बाहर ...इस गफलत से
कि फर्क पड़ता है किसी को
हमारे होने या न होने से

साथ जीने मरने की कसमें खाना ...
....अलग बात है
या कह लो सिर्फ बात है.

साथ साथ लोग जी सकते हैं
साथ मरते भई मैंने तो किसी को नहीं देखा.

12 comments:

  1. साथ मरते किसी को नहीं देखा .... सटीक ... आज प्रेम के रंग से अलग फलसफा ...

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    1. प्रेम का ही पहलू है ...यह भी

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  2. सच कहा.....
    आप किसी के साथ जी सकते हैं...किसी के साथ मरते नहीं...

    अनु

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  3. सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

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  4. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/12/2012-9.html

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    1. हार्दिक धन्यवाद!!

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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