अक्सर
अपने घर के अकेलेपन में
महसूस होते हो तुम .
मैंने देखे हैं तुम्हारे होंठों के निशाँ
अपनी चाय की प्याली पे .
गीला तौलिया बिस्तर पे पडा
मुझको चिढाता हुआ.
सुनाई देती हैं मुझे मेरी आवाज़
जब दिखती हैं ,तुम्हारी चप्पलें
सारे घर में मटरगश्ती करती हुई .
तुम्हारी महक से पता नहीं कैसे
महकती हूँ मैं ...दिन और रात
आजकल यूँ ही
मुस्कुराती हूँ मैं...बेमतलब ,बेबात
बताओगे...?
ऐसा ही होता है क्या
किसी के इंतज़ार में .
<3
ReplyDeleteकोई क्या बताएगा जानेमन...अपने दिल से पूछो :-)
अनु
मेरे हिसाब से तो ऐसा ही होता है ...अनु.
Deleteबहुत सुन्दर भाव
ReplyDeleteएहसास बहुत खूबसूरती से लिखे हैं ...
ReplyDeleteजी.....शुक्रिया!
Deleteबहुत खूबशूरत अहसास,,,,
ReplyDeleterecent post: बात न करो,
आभार!!
Deleteऐसा ही होता है यकीनन इतंजार में !
ReplyDeleteजी ...
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteअच्छी रचना
शुक्रिया............पसंद करने के लिए.
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