Wednesday, December 5, 2012

इंतज़ार में




अक्सर
अपने घर के अकेलेपन में
महसूस होते हो तुम .

मैंने देखे हैं तुम्हारे होंठों के निशाँ
अपनी चाय की प्याली पे .
गीला तौलिया बिस्तर पे पडा
मुझको चिढाता हुआ.

सुनाई देती हैं मुझे मेरी आवाज़
जब दिखती हैं ,तुम्हारी चप्पलें
सारे घर में मटरगश्ती करती हुई .

तुम्हारी महक से पता नहीं कैसे
महकती हूँ मैं ...दिन और रात
आजकल यूँ ही
मुस्कुराती हूँ मैं...बेमतलब ,बेबात
बताओगे...?
ऐसा ही होता है क्या
किसी के इंतज़ार में .

12 comments:

  1. <3

    कोई क्या बताएगा जानेमन...अपने दिल से पूछो :-)

    अनु

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    1. मेरे हिसाब से तो ऐसा ही होता है ...अनु.

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  2. बहुत सुन्दर भाव

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  3. एहसास बहुत खूबसूरती से लिखे हैं ...

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  4. ऐसा ही होता है यकीनन इतंजार में !

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  5. Replies
    1. शुक्रिया............पसंद करने के लिए.

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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