Monday, March 19, 2012

मन की सैर



आज,यूँ ही,
खाली बैठे -बैठे
मन में ख्याल आया कि
चलो,आज...
मैं अपने मन की सैर करने निकल पडूँ .

मन में एक दुनिया है....सबसे छुपी ,
यादों की उस दुनिया में निकल पडी
हर जगह एक ही चेहरा दिखायी देता है
परेशान हूँ कि क्यूँ... बस
तुमसे  जुड़ी बातें,सौगातें दिखाई देंती हैं.

क्या करूँ???मेरे मन में...
ज़रा सी भी जगह खाली नहीं है.
किसी के लिए कोई कोना नहीं है .
वो शख्स,उसकी बातें ...
जी से बेघर हो ,जाएँ कहीं ...
तब तो कुछ और घर करे .
लाख जतन कर चुकी,मैं भी
पिछली इबारत मिटती ही नहीं
इस ही वजह से
नए को जगह कभी मिलती नहीं.

सच कहूँ....तो, मैं खुद भी मिटाना नहीं चाहती
तुम से जुड़ी एक भी याद ...आधी भी बात .
तुम्हारे  साथ जी नहीं सकी
इनके साथ जी तो रही हूँ....
और
मरूंगी भी इनके साथ .
मुझे कुछ नहीं कहना इसके सिवा
कि,
इसके लिए तो मुझे....
तुम्हारी परमिशन भी नहीं चाहिए .

30 comments:

  1. गहन ...गंभीर ...मन कि बात ....
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति और टेम्प्लेट भी उतना ही सुंदर ...!!
    शुभकामनायें ...!!

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    1. अनुपमा जी...दोनों ही चीज़ों को पसंद करने और सराहने हेतु आभार.

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  2. Nidhi....Life is cruel when it has only one person in its heart, and vo bhi sirf uski yaadein..voh khud nahi! Maine aapki kisi ek post par comment kiya tha agle janm wali umeed....aaj bhi vahi feeling aati hai yeh pad ke. Life is beautiful with 'those' memories. I wish ki aapko aapki 'un' yaadon se sirf khushiya hi mile.

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    1. शैफाली....अगले जन्म की बात ...ख्याल अच्छा है.यकीनन मैं खुश हूँ....वो नहीं तो यादें ही सही.

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  3. लाख जतन कर चुकी,मैं भी
    पिछली इबारत मिटती ही नहीं
    इस ही वजह से
    नए को जगह कभी मिलती नहीं.

    बहुत खूबसूरती से व्यक्त किये हैं जज़्बात....
    very nice...

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    1. आपको ....जज्बातों की यह बानगी पसंद आयी...शुक्रिया.

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  4. मन की बातें मन ही जाने………सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  5. बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति,बेहतरीन सटीक रचना,......

    MY RESENT POST... फुहार....: रिश्वत लिए वगैर....

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    1. आपका हार्दिक धन्यवाद!!

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  6. मन की सैर का जबाब नहीं ..
    बढिया भावाभिव्‍यक्ति !!

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    1. पसंद करने के लिए आभार.

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  7. आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ. अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)

    इस उत्कृष्ट रचना के लिए ... बधाई स्वीकारें.

    नीरज

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    1. शुक्रिया.!!आप पहली फुर्सत मिलते ही ब्लॉग पर आये...रचना पढ़ी,पसंद की,सराही ...यह बहुत है,मेरे लिए.

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  8. लाख जतन कर चुकी,मैं भी
    पिछली इबारत मिटती ही नहीं
    इस ही वजह से
    नए को जगह कभी मिलती नहीं.

    ऐसा ही होता है कुछ सभी के साथ...
    खूबसूरत...!!

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    1. पूनम ..होता है न?

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  9. यादें मिटती भी नहीं ...अच्छी रही मन की सैर

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    1. बस ,सैर अच्छी रही...यदा-कद करती रहती हूँ.

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  10. madam kya kahu lajabab likhti hai aap...........
    bahri chizon ke lie hum hamesa permission lete hai par man ke undar waha na to kisi ki permission ki jarurat hai or na dakhalandazi chahiye.................behad hi pyari rachna............aabhar....

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    1. बड़े दिन बाद ....हाँ,आरती ..यह अच्छा है कि अंतर्मन के लिए किसी की आज्ञा नहीं चाहिए होती .धन्यवाद,पसंद करने के लिए.

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  11. निधि जी
    नमस्कार !
    ........बहुत खूब...बेहतरीन प्रस्तुति...बेहतरीन कविता

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    1. संजय जी...कितने लंबे लंबे समय के लिए,आप गायब हो जाते हैं...उम्मीद करती हूँ सब कुशल-मंगल होगा.
      कविता की सराहना हेतु,आभार.

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  12. कुछ यादें कुछ पल कुछ ख्वाब दूसरे को आने ही नहीं देते पास कभी ... बहुत उम्दा ...

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    1. यही तो त्रासदी है,जीवन की

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  13. सचमुच मन नहीं दस-बीस...इस मन में बसी उसकी तस्वीर को निकाल कर किसी दूसरी तस्वीर को रखना बच्चों का खेल नहीं...कि खेले और फिर भूल गए...वह तो मन के पट पर अंकित होकर सदा-सदा के लिए उसके हार्ड-डिस्क में अंकित हो चुकी है...जिसे डिलिट करने का अधिकार न खुद को है और न ही किसी और को...पर क्या इतना काफी नहीं कि हम जब चाहें उस पेज़ को खोल कर पढ़ सकते हैं और उसमें डूबे रह सकते हैं।

    आप की कविताओं में प्रेम-रस कू़ट-कूट कर भरा रहता है। लगता है प्रेम में खूब रमी हैं आप...अच्छा है।

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    1. बढ़िया रिलेट किया आपने,कंप्यूटर को मन से...वही शब्दावली...डिलीट,हार्डडिस्क,पेज ..अच्छा है.
      प्यार में रमा होना तो अच्छा ही है ,न .

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  14. सच कहूँ....तो, मैं खुद भी मिटाना नहीं चाहती
    उससे जुड़ी एक भी याद ...आधी भी बात .
    उसके साथ जी नहीं सकी
    इनके साथ जी तो रही हूँ....
    और
    मरूंगी भी इनके साथ .

    जिसके मन ने ये बात स्वीकारी हो ...वो पुराने को मिटाने ..नयी इबारत लिखने की बात बेमन से ही कहता होगा ...ऐसा मान सकती हूँ न

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    1. बेमन से कहो या मन से कुछ काम करने पड़ते हैं ........

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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