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शर्तों पर प्यार ........... असंभव है ,यार! |
असंभव है ,यार!
क्यूकि,
शर्तों पे रिश्ता
निभ नहीं सकता .
भला , कैसे यह संभव है .........
कि,
तुम मुझे यह दो तो मैं वह दूंगा ,
या तुम यह करो तो मैं वह कर लूँगा.
सम्बन्ध :
जुड़ते हैं वहीँ
निभते चले जाते हैं खुद ही
जहाँ प्राथमिकता होती है
जोड़ने वाले;
समर्पण, प्यार,मनुहार की.
रिश्ते,
बिखरते हैं वहीँ
टूटते जाते हैं स्वयं ही
जहाँ प्राथमिकता होती है
तोड़ने वाले;
शर्तों के व्यवहार की .
इसलिए ये तय है
की
शर्तों पर प्यार नहीं होता
शर्तों पर बस व्यापार होता है .
सम्बन्ध जुड़ते हैं वहीं....
ReplyDeleteप्यार और समर्पण को प्राथमिकता देती आपकी यह रचना अच्छी लगी
वंदना जी...धन्यवाद...रचना को पढ़ने एवं सराहने के लिए
ReplyDeleteशर्तों पर प्यार असंभव है.
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है आपने.
सादर
बिल्कुल सही कहा है ..जहाँ शर्तें होती हैं वहाँ प्यार कहाँ ...
ReplyDeleteबिलकुल सच.शर्तों पर प्यार तो क्या,कोई भी रिश्ता नहीं निभ सकता.
ReplyDeleteसुन्दर अभिव्यक्ति.
शर्तों पर भी कभी प्यार होता है...
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है...
kash ye baat sab samajh jaye to darare khaiyon me nirmit na ho. bahut sunder.
ReplyDeleteयशवंत जी...शुक्रिया!!
ReplyDeleteसंगीता जी...सच...जहां शर्ते होंगी वहाँ प्यार अपने आप ही दम तोड़ देगा ..
ReplyDeleteशिखा....वाकई...शर्तों पे आधारित किसी भी रिश्ते में प्यार की कोई गुंजाइश ही नहीं होती
ReplyDeleteवीणा जी...धन्यवाद!!
ReplyDeleteअनामिका जी...काश ऐसा हो जाए ना....तो,कितना अच्छा हो .
ReplyDeleteबहुत सही लिखा है आपने.. शर्तों पर प्यार नहीं व्यापार होता है..
ReplyDeleteसहमति हेतु...शुक्रिया!!
Deleteअच्छा ख्याल..!!
ReplyDeleteथैंक्स..ख्याल को पसंद करने के लिए.
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