Thursday, November 22, 2012

गुमशुदा



तेरी यादों की भीड़ में ...मैं गुमशुदा
बहुत हो चुका
अब तुम्हें आना ही होगा
कि मैं भी थक चुकी हूँ
इस कोलाहल से .

चले आओ
यादों से निकलकर
मेरे ऐन सामने
कि अब मैं खुद को
पाना चाहती हूँ .

18 comments:

  1. बहुत सराहनीय प्रस्तुति.

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  2. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  3. क्या खोया....
    क्या पाया.....!!

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    1. सबसे मुश्किल सवाल...

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  4. यादें जब दिल में शोर मचाएं ....तो खुद की आवाज खो जाती है उसमें .....खुद को ढूंढना हो अगर तो फिर से भरना होगा प्यार जीवन के रीते घट में

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    1. प्यार..भरने की प्रक्रिया..इतनी आसां है क्या ?खुद को ढूँढ पाना...बड़ा ही मुश्किल है.

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  5. सुन्दर रचना हेतु बहुत-बहुत बधाई,

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    1. तहे दिल से आपका शुक्रिया!

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  6. सुन्दर रचना..
    :-)

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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