मैली कुचैली साडी पहने
वो सब्जी बेचने वाली औरत
अक्सर,
अपनी टोकरी उठाए
मेरी गली से भी गुज़रती है.
पान मुंह में दबाये
कोई गीत गुनगुनाते हुए
अपने आदमी के हाथ से
रात जो पिटी थी उसे बिसराए.
बीच-बीच में
हीरा ....सिकंदर की बातों पे हँसती
बाक़ी आदमियों की नज़रों को पढती
अपने गदराए बदन पे इतराए हुए.
उसकी आवाज़ का.....
सब्जी ले लो की सुरीली तान का
किस किस को इंतज़ार रहता है
उसे पता है.
उन घरों के आगे दो मिनट ज़्यादा रुकती है
जोर से आवाज़ लगाती है
जिनका पता है
कि मेमसाहिब नौकरी पे निकल चुकी होंगी
और साहब नौकरी पे निकलने के लिए
अभी शेव कर रहे होंगे .
:) बहुत सजीव चित्रण
ReplyDeleteशुक्रिया!!
Deleteबहुत ही सुन्दर और सजीव चित्रण...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना...
:-)
थैंक्स!!
Deleteह्म्म्म्म्म्म
ReplyDeletegreat observation!!!
anu
धन्यवाद!
Deleteअच्छी रचना
ReplyDeleteबहुत सुंदर
हार्दिक धन्यवाद!
Delete
ReplyDeleteकल 18/11/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
तहे दिल से शुक्रिया!
Deleteशामिल करने के लिए,आभार......
ReplyDeleteसजीव चित्रण |
ReplyDeleteब्लॉग पर की गई सभी टिप्पणियाँ एक जगह कैसे दिखाएँ ?
मैंने ट्राई किया था पर उसमें टिप्पणियों के साथ साथ ..न जाने और क्या क्या आ रहा था...इसलिए हटा दिया
Deleteबहुत ही सुन्दर और सजीव चित्रण...
ReplyDeleteथैंक्स!
Deleteयथार्थपूर्ण रचना
ReplyDeleteशुक्रिया!
Deleteज़िन्दगी एक किताब सी है,जिसमें ढेरों किस्से-कहानियां हैं .............
ReplyDeleteऔर उनमें से यह भी एक है ???
:-) शुभकामनायें!
थैंक्स!
Deleteवाह निधि जी ...सुन्दर और सजीव चित्रण किया है आपने सब्जी वाली का
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