Friday, November 16, 2012

सब्जी बेचने वाली



मैली कुचैली साडी पहने
वो सब्जी बेचने वाली औरत
अक्सर,
अपनी टोकरी उठाए
मेरी गली से भी गुज़रती है.

पान मुंह में दबाये
कोई गीत गुनगुनाते हुए
अपने आदमी के हाथ से
रात जो पिटी थी उसे बिसराए.
बीच-बीच में
हीरा ....सिकंदर की बातों पे हँसती
बाक़ी आदमियों की नज़रों को पढती
अपने गदराए बदन पे इतराए हुए.

उसकी आवाज़ का.....
सब्जी ले लो की सुरीली तान का
किस किस को इंतज़ार रहता है
उसे पता है.
उन घरों के आगे दो मिनट ज़्यादा रुकती है
जोर से आवाज़ लगाती है
जिनका पता है
कि मेमसाहिब नौकरी पे निकल चुकी होंगी
और साहब नौकरी पे निकलने के लिए
अभी शेव कर रहे होंगे .

21 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर और सजीव चित्रण...
    बहुत सुन्दर रचना...
    :-)

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  2. ह्म्म्म्म्म्म
    great observation!!!

    anu

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  3. आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (17-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. शामिल करने के लिए,आभार......

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  4. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद!

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  5. कल 18/11/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. तहे दिल से शुक्रिया!

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  6. Replies
    1. मैंने ट्राई किया था पर उसमें टिप्पणियों के साथ साथ ..न जाने और क्या क्या आ रहा था...इसलिए हटा दिया

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  7. बहुत ही सुन्दर और सजीव चित्रण...

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  8. यथार्थपूर्ण रचना

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  9. ज़िन्दगी एक किताब सी है,जिसमें ढेरों किस्से-कहानियां हैं .............
    और उनमें से यह भी एक है ???
    :-) शुभकामनायें!

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  10. वाह निधि जी ...सुन्दर और सजीव चित्रण किया है आपने सब्जी वाली का

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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