माना कि मैं नहीं हूँ तेरी मंजिल
पर सुनो तो ऐ संगदिल ..
थोड़ी दूर साथ चले चलते हैं .
तुझे खो के जी पाऊं मुमकिन नहीं
तुझे पा सकूँ
ऐसा भी हो सकता नहीं
तो चलो ऐसा कर लेते हैं
तुझे पाने की आरज़ू में जी लेते हैं.
साथ हंसने को हैं बहुत लोग
तुम्हारे-मेरे आस पास
अश्क आयें जो आँखों के आसपास
तब हम एक दूजे के
काँधे को याद कर लेते हैं
मैं एक सवाल पूछूं ...
तुम जवाब दे दो तो जानूँ ..
हम एक दूसरे के क्या लगते हैं??
ReplyDeleteकुछ तो रिश्ता है..वरना अपना गम कोई गैरों से नहीं बांटता.
बहुत सुन्दर निधि....
अनु
:-))
Deleteकुछ भी नहीं....
ReplyDeleteफिर भी
सब कुछ....!!
कुछ न होकर भी सब कुछ
Deleteअच्छी रचना
ReplyDeleteबहुत सुंदर
थैंक्स.
Deleteजीवंत भावनाएं.सुन्दर चित्रांकन,बहुत खूब
ReplyDeleteबेह्तरीन अभिव्यक्ति
आभार.
Deleteमाना कि मैं नहीं हूँ तेरी मंजिल
ReplyDeleteपर सुनो तो ऐ संगदिल ..
थोड़ी दूर साथ चले चलते हैं ...मेरी हिम्मत पर ही सही
हाँ...बस,किसी सूरत साथ चलो...
Deleteबेहतरीन अभिव्यक्ति , "मेरे क्या लगते हो" आपकी रचना से प्रेरित इस पंक्ति को भविष्य के लिए नोट किया है ! आभार आपका !
ReplyDeleteशुक्रिया.
Deleteअश्कों के रिश्ते का ...दर्द के रिश्ते का नाम नहीं हुआ अब तक ....रिश्तों के शब्दकोष तलाशे हैं मैंने सारी उम्र
ReplyDeleteहम्म्म्म
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