Saturday, August 20, 2011

तुम और मैं ...अच्छे ,सच्चे दोस्त

तुम और मैं
एक अच्छे ,सच्चे दोस्त .
पर,अब तुम और तुम्हारे कदम
अचानक ...
दोस्ती की सीमा लांघने लगे हैं
प्रेम की राह पर जाने लगे हैं .
तुम जो यूँ प्रेम पथ पर
आगे बढ़ने को आतुर हो,अकेले
सोच कर के देखो तो ज़रा
अच्छी दोस्त होने के नाते
मैं सब समझते बूझते
कि
मेरी "न" तुम्हें दुःख पहुंचायेगी
अपनी जुबां से इनकार कर पाउंगी ??

अच्छा,चलो ,मान लो जो हिम्मत कर
मैं तुम्हारे प्रेम निवेदन को ठुकरा भी दूं
तो,क्या मैं इसके अपराधबोध से
स्वयं ग्रसित नहीं हो जाऊँगी.
इसलिए,
मेरा यही अनुग्रह है तुमसे
कि अपनी सीमा में रहो
मेरी सीमाएं भी न भंग करो
क्यूंकि...
मेरी न सुनने के बाद
तुम जब व्यथित होगे
तो तुम यह तय जानो
मुझे भी असहज कर दोगे ,
इसलिए
अभी,कृपया ऐसे आमंत्रण मुझे न भेजो
जिसके उत्तर में चुप्पी साध लेने से मुझे भी कष्ट हो
और मेरी इस चुप्पी से तुम्हारी आत्मा भी त्रस्त हो .


अभी,अपनी परिधि मत पार करो
कटाक्षों से मुझपे मत वार करो .
तुम्हारे पूछे सारे प्रश्न
अनुत्तरित ही रह जायेंगे
क्यूंकि,प्रेम डगर पे मुड के
अलग खड़े हो गए हो जाके .
मैं मित्रता की पक्षधर ...तुम प्रेम पुजारी हो गए हो .



मुझे प्लीज़ कुछ समय दो
कि मैं निकल पाऊँ उस दोस्ती की सीमा से
छोड़ आये हो तत्परता से तुम जिसे ...कहीं पीछे
और फिर...............
हम दोनों.....एक साथ
तोड़ कर मित्रता का पाश
प्रवेश करें ,प्रेम की परिधि में
एक दिन...साथ-साथ;कुछ समय बाद .

27 comments:

  1. आह....क्या कहूँ ????
    इतनी गहरी बात कही है आपने....

    समय तो लगता ही है ...दायरों के टूटने में.....शायद वो समत जरुरी भी होता है....

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  2. आपने दोस्ती और प्रेम के भावों की अनुपम प्रस्तुति की है.
    क्या बिना 'प्रेम' के दोस्ती संभव है.
    क्या 'प्रेम' मन और बुद्धि का जुडाव है,
    या केवल शरीर का आकर्षण मात्र ?
    कहतें हैं प्रेम आत्मिक मिलन की डोरी है.
    फिर प्रेम से डर कैसा?

    मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है.

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  3. भावनाओं की हृदयस्पर्शी प्रस्तुति...

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  4. भावमयी रचना अच्छी लगी , बधाई

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  5. दोस्ती और प्रेम की कश्मकश को बखूबी लिखा है ..अच्छी प्रस्तुति

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  6. mastishk ke taar shabd shabd se jud jate hain...

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  7. बहुत ही भावमयी रचना....

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  8. आज कुशल कूटनीतिज्ञ योगेश्वर श्री किसन जी का जन्मदिवस जन्माष्टमी है, किसन जी ने धर्म का साथ देकर कौरवों के कुशासन का अंत किया था। इतिहास गवाह है कि जब-जब कुशासन के प्रजा त्राहि त्राहि करती है तब कोई एक नेतृत्व उभरता है और अत्याचार से मुक्ति दिलाता है। आज इतिहास अपने को फ़िर दोहरा रहा है। एक और किसन (बाबु राव हजारे) भ्रष्ट्राचार के खात्मे के लिए कौरवों के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है। आम आदमी लोकपाल को नहीं जानता पर, भ्रष्ट्राचार शब्द से अच्छी तरह परिचित है, उसे भ्रष्ट्राचार से मुक्ति चाहिए।

    आपको जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं एवं हार्दिक बधाई।

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  9. अजीब विडम्बना है..!!

    क्या आवश्यक है..मित्रता की राह प्रेम तक ही जाय..???? क्या मित्रता प्रेम से ऊपर नहीं उठ सकती..??? क्या एक ऐसा समन्वय जहाँ प्रेम, सामंजस्य, स्नेह, दया, करुणा, विश्वास, समर्पण की धरा बहे; हो सकता है..???

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  10. कुमार....सही कहा ,तुमने ...दायरों को टूटने में कुछ वक्त तो लगता है.

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  11. राकेश जी.......आभार !!प्रेम आत्मिक अनुभूति है पर उसके लिए हमारी इन्द्रियाँ भी सहायक होती हैं.आपकी पोस्ट को अवश्य देखूंगी .

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  12. रोहित ..धन्यवाद !

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  13. सुनील जी...शुक्रिया!

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  14. रश्मिप्रभा जी...संगीता जी...आप दोनों का हार्दिक धन्यवाद !!

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  15. सुषमा....थैंक्स!!

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  16. ललित जी....आपको भी बहुत बधाई

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  17. प्रियंका...मित्रता की राह प्रेम तक जाती है...प्रेम से ऊपर मैं किसी को नहीं मानती क्यूंकि जितने भाव तुमने गिनाए हैं वो सब के सब प्रेम में समाहित हो जाते हैं.
    यूँ देखो तो...मित्रता में प्रेम और प्रेम में मित्रता ....उसे एक नयी ऊंचाई देते हैं.

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  18. नयंक पटेलAugust 23, 2011 at 8:05 AM

    मित्रता में मुझे लगता है काफी आदरणीय भाव रहता है , प्रेम में , होना तो नहीं चाहिए , हक जताना आही जाता है , दोस्त की बात बुरी नहीं लगती है , प्रेमी की लग सकती है . कहा गया है प्रेम में सिर्फ देने का भाव रखें ,अपेक्षा ना रखें लेकिन अक्शर ऐसा नहीं होता है . अपेक्षाएं बढ़ जाती है, प्रेम में ना केहने की बात भी मर्यादा को छोड़ के की जाती है . वो सिर्फ मेरा या वो सिर्फ मेरी ऐसी मालिकी की भावना दिल में पैदा हो जाती है . जलन और गुस्सा भी जन्म लेता है . मेरा मानना है अगर दोस्त , प्रेम तो होता ही है लेकिन जिस अंदाज़ से हम प्रेम कहते है, वो प्रेम के प्रेमी बन जाते है फिर भी एक अच्छे दोस्त बने रेहना चाहिए और मर्यादा , आदरणीय भाव और सहने की भावना के साथ आगे बढ़ना चाहिए. दोस्त , प्रेमी या फिर पति-पतनी कोई भी रिश्ता हो दोस्त दोस्त ही रेहना चाहिए, दोस्ती का नज़रियाँ बदलना नहीं चाहिए क्यों सबसे ज्याद सुख और शांति उस रिश्ते में ही मिलेगी . इसलिए तो कुछ उम्र के बाद बाप-बेटे और माँ-बेटी को भी दोस्त बन जाना चाहिए क्यों यही एक रास्ता है जो एक दुसरे को समज के चलने का मौका देता .

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  19. नयंक......थैंक्स !!इतना सुन्दर विश्लेषण करने के लिए...मैं मानती हूँ कि किसी भी रिश्ते में प्रेम का होना आवश्यक है क्यूंकि प्रेम होने से बाकी सभी भाव रिश्ते में स्वतः आ जाते हैं...हक जताना किसी भी रिश्ते की डोर को कमज़ोर करता है..
    प्रेम जब देह से जुड जाता है ...तो भी उसमें मित्रता का भाव रहे तो वो पुख्ता और मजबूत होता है.

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  20. प्रियंका....थैंक्स !!

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  21. आदरणीय निधि जी
    नमस्कार !
    यथार्थ परक भाव पूर्ण एवं प्रेरक प्रस्तुति ....सादर अभिनन्दन !!!

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  22. आदरणीय निधि जी
    नमस्कार !

    बेमिसाल ! बस लिखने के लिए नहीं लिखी मैंने.. वास्तव में अद्भुत कृति है.. अभिव्यक्ति के ऐसे तरीके भी हो सकते हैं.. आज जाना.. बस एक बात -
    नायिका अगर अपनी बात और भी तर्क पूर्ण ढंग से पेश करके नायक को दोस्ती तक रोक पाती तो मुझे और भी आनंद आता.. ये याचना स्वानंद के लिए है... क्षमा करेंगे.. वैसे आपकी रचना बहुत अच्छी है.. आभार...

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  23. संजय जी....खुशामदीद ....आपकी प्रतिक्रया कई दिन बाद पढ़ने को मिली ...अच्छा लगा...आभार !!

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  24. अनिलजी ........नमस्ते!!आप ब्लॉग पर आये ...रचना को पढ़ा ...समय निकाल कर टिप्पणी करी...हार्दिक धन्यवाद !!
    रचना को पसंद करने के लिए शुक्रिया ..जहां तक बात है आपकी राय की,तो मुझे अच्छा लगा कि आपने अपने दिल की बात कही...हाँ एक पक्ष यह भी हो सकता था...पर वही है जब आप लिखने बैठते हैं तो यह आवश्यक नहीं होता कि पात्र आपकी कही सुनें..
    आप यूँ ही अपनी प्रतिक्रया से अवगत करेंगे तो अच्छा लगेगा .

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  25. बेहद उम्दा रचना है .. निधि...

    दुश्मन बनने में आशिकों को देर नहीं लगती
    ताल्लुकात को महज़ दोस्ती तक महफूज रखना

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  26. मित..........आज संजय मामा ने एक स्टेटस डाला है वो लिख रही हूँ और आपके जवाब में ...मैंने जो वहाँ लिखा है वही फिर लिख रही हूँ there is never a past tense in luving someone.........................either you always will.......................or........................never did
    बस प्यार करना काफी नहीं होता क्या...मैंने चाहा किसी को...पूरी शिद्दत से...टूट कर...दिल ,जान सब वार दी...हार दी उसपे... फिर रह क्या जाता है ???आज -कल जैसा ....हारने -जीतने जैसा ...मुझमें जब कुछ बचा ही नहीं अपना...जो था सब उसका...तो फिर कहाँ का मेरा -तेरा किसी तारीखें??????जीत हार तो दो के बीच होती है न..?जो कभी आशिक रहा है...मुझे नहीं लगता कि ख्वाब में भी वो कभी अपनी चाहत का बुरा चाहेगा
    अगर वो ऐसा सोचता या करता है तो उसकी मोहब्बत झूठी थी...उसने सच में कभी प्यार किया ही नहीं...

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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