बहुत कडवी है यह ज़िन्दगी
उतरती है सीने में
जला देती है जिगर.
आँखों के पानी में
घोले बिना ,
इसे पीना ...जीना
लगभग नामुमकिन ।
ज़िंदगी की इस तल्ख़ी को
थोड़ा कम कर लें
आओ, उससे बात कर लें
थोड़ा सा नशा कर लें
थोड़ा सा जी लें
थोड़ा सा मर लें
उससे अपने रिश्ते को
ज़रा कसौटी पर कस लें
खुबसूरत अभिवयक्ति..
ReplyDeleteशुक्रिया!
Deletebahut khoob ... rishton ko to vaise bhi kasoti pe kasnaa jaroori hai jab kaduvaahat ho ...
ReplyDeleteकसौटी पर कसना ...दिल को गवारा नहीं होता
Deleteपरखना मत परखने से कोई रिश्ता नहीं रहता...
ReplyDeleteजी....कोशिश तो यही रहती है कि परखना न पड़े
Deleteभुलावे में जीना कुच पलों का सुख तो देता ही है पर बात तो करनी चाहिये, सच्चाई तो जाननी चाहिये।
ReplyDeleteसच..अपने मन मुताबिक़ न हुआ तो जिन भ्रम के सहारे जिया जा रहा है...वो भी ख़त्म
Deleteबहुत खुबसूरत !
ReplyDeleteनई पोस्ट लोकतंत्र -स्तम्भ
आभार!
Delete:)
ReplyDeleteप्रतीक्षारत
हार्दिक धन्यवाद!
ReplyDeleteथैंक्स!
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