Thursday, November 14, 2013

कडवी ज़िंदगी


बहुत कडवी है यह ज़िन्दगी
उतरती है सीने में
जला देती है जिगर.
आँखों के पानी में
घोले बिना ,
इसे पीना ...जीना
लगभग नामुमकिन ।

ज़िंदगी की इस तल्ख़ी को
थोड़ा कम कर लें
आओ, उससे बात कर लें
थोड़ा सा नशा कर लें
थोड़ा सा जी लें
थोड़ा सा मर लें
उससे अपने रिश्ते को
ज़रा कसौटी पर कस लें

16 comments:

  1. खुबसूरत अभिवयक्ति..

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  2. bahut khoob ... rishton ko to vaise bhi kasoti pe kasnaa jaroori hai jab kaduvaahat ho ...

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    1. कसौटी पर कसना ...दिल को गवारा नहीं होता

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  3. बहुत सुंदर

    मित्रों कुछ व्यस्तता के चलते मैं काफी समय से
    ब्लाग पर नहीं आ पाया। अब कोशिश होगी कि
    यहां बना रहूं।
    आभार

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (15-11-2013) को "आज के बच्चे सयाने हो गये हैं" (चर्चा मंचःअंक-1430) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. हार्दिक धन्यवाद!

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  5. परखना मत परखने से कोई रिश्ता नहीं रहता...

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    1. जी....कोशिश तो यही रहती है कि परखना न पड़े

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  6. भुलावे में जीना कुच पलों का सुख तो देता ही है पर बात तो करनी चाहिये, सच्चाई तो जाननी चाहिये।

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    1. सच..अपने मन मुताबिक़ न हुआ तो जिन भ्रम के सहारे जिया जा रहा है...वो भी ख़त्म

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