Wednesday, May 30, 2012

प्रेम की दातून


मैं तो एक भी दिन
इस दातून की कड़वाहट
के बिना नहीं जी सकती .
मुझे ,आदत हो गयी है,इसकी.
मुझे दरअसल और कुछ नहीं हुआ है
बस,प्यार से ही प्यार सा हो गया है .

ब्रश ,के लिए
तो फिर बाज़ार तक का चक्कर लगाना पड़ेगा...
यूँ भी मेरा मन उस प्लास्टिक में नहीं रुचता.
दातून कितना अपना सा है...
मेरे घर के पीछे जो खाली हिस्सा है न...वहाँ है एक प्रेम का
सॉरी -सॉरी नीम का पेड....दातून की दूकान !!
उसी से तोडती हूँ....चूस के ,चबा के
सारी कड़वाहट से खुद को मांजती हूँ
लोग थूक देते हैं,उसकी कड़वाहट
मैं तो उसे भी पी लेती हूँ

सच कहूँ.......
रोज इसी बहाने जी लेती हूँ
प्रेम से दिन शुरू कर लेती हूँ

14 comments:

  1. Replies
    1. पसंद करने के लिए आभार!!

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  2. प्रेम में कड़वाहट
    बस उतनी ही है जितनी
    नीम की दातून में
    और जो इस कड़वाहट को पीना
    जीना सीख जाता है
    वह प्रेम की जड़ों को सिंचने लगा
    प्रेम अब हरा-भरा है
    सच...
    .

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    1. आपकी टिप्पणी पढ़ आकर आनंद आ जाता है

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  3. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  4. सच कहूँ.......
    रोज इसी बहाने जी लेती हूँ
    प्रेम से दिन शुरू कर लेती हूँ

    बहुत सुंदर प्रस्तुति,,,,,

    RECENT POST ,,,,, काव्यान्जलि ,,,,, ऐ हवा महक ले आ,,,,,

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  5. बहुत खूब ...सच में प्रेम की आदत हो गई हैं

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    1. और आदतें मुश्किल से जाती हैं

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  6. कड़वाहट से खुद को माँजना.... और पी लेना...
    बढ़िया बिम्ब प्रयोग.... सुंदर रचना...
    सादर।

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    1. बिम्ब ..आपको अच्छा लगा,जान कर मुझे अच्छा लगा

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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