मेरी सब बातों में सबसे ज्यादा
मेरा सच बोलना,मेरी बेबाकी
तुम्हें पसंद आयी थी ,पर...
आज मैं मान लेती हूँ कि
अब अक्सर झूठ बोलती हूँ मैं
जब कहती हूँ तुमसे ..कि
तुम्हारे किसी और के साथ होने से
मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता
तुमसे मिले कई दिन गुजर जाएँ
तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
तुमसे बात नहीं होती
तो मेरा दिन आराम से गुज़रता है
तुम साथ न भी हो तो मुझे
खालीपन ज़रा सा भी नहीं खलता
काली स्याह उदास रातों में
तुम ख़्वाबों में नहीं आते हो
जब यादों की बदली छाती है मन पे
तो कभी नहीं रुलाते हो
मेरे पास बहुत काम हैं सच्ची ..
तुम्हारी फ़िक्र करने के अलावा
आजकल मुझे सब लोग अच्छे लगते हैं
बस एक तुम्हारे सिवा
"कुछ नहीं" और "पता नहीं"कहती हूँ
तो उसका मतलब वही होता है
तुम परेशां होते हो ,ग़मगीन होते हो
तो मुझे ज़रा भी दर्द नहीं होता
तुम्हारे बगैर..
अपनी कसम खा के कहती हूँ
मैं बहुत खुश रहती हूँ
तुम्हारे मेरे पास ना होने पे भी मैं
बिलकुल नोर्मल जीवन जीती हूँ
मैं फिल्में देखती हूँ,गाने सुनती हूँ
और तुम्हें.. यूँ ही बस भूल जाती हूँ
कभी शराब के नशे में,
और कभी किताबों में
खुद को डुबो कर तुम्हें भी डोब देती हूँ
मेरा कभी भी मन नहीं करता
कि तुम वो तीन लफ्ज़ कहो
नहीं चाहती कि तुम मिलने आओ
और रुक जाओ मेरे कहने भर से
कभी नहीं चाहा कि तुम कहो कि
मैं हर एक काम से ज़रूरी हूँ तुम्हारे लिए
इच्छा ही नहीं हुई कि तुमसे सुनूं
तुम्हारी धडकनों और रूह में हूँ.. मैं
यह जानने का कभी मन नहीं हुआ
कि तुम मुझे चाहते हो कितना
पूछना नहीं चाहती
कि क्या तुम भी उतने ही अकेले हो
मेरे बिना ,जितनी मैं हूँ ,तुम्हारे बिना
सच कहती हूँ .....
झूठी हूँ मैं.....पक्की झूठी !!