Tuesday, February 11, 2014

बसंत का मौसम


मिलना
बिछड़ जाना
ज़िन्दगी में सब बदल जाना।
मौसम आये ...गुज़रते रहे सालों साल
पर जो नहीं बदला
वो तेरा मेरा हाल
कुछ है कि पीले पत्तों से लिपटा पतझड़
तेरे ज़र्द चेहरे पर ठहर गया है
और वो गीला सा सावन
मेरी आँखों में रुक गया है
चलो,
इन दोनों मौसमों को विदा कर दें
मिलें हम दोबारा
बसंत हमारा इंतज़ार कर रहा है
न जाने कब से

18 comments:

  1. कुछ है कि पीले पत्तों से लिपटा पतझड़
    तेरे ज़र्द चेहरे पर ठहर गया है
    और वो गीला सा सावन
    मेरी आँखों में रुक गया है
    ...लाज़वाब...बहुत कोमल अहसास और उनकी मनभावन अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर..

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    1. धन्यवाद!!.....कैलाश जी

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  2. आपकी इस प्रस्तुति को आज की आज कि बुलेटिन - क्या हिन्दी ब्लॉगजगत में पाठकों की कमी है ? में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. मेरी रचना को शामिल करने हेतु,आभार!!

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  3. भावो का सुन्दर समायोजन......

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  4. वाह ... अनुपम भाव संयोजन
    बहुत खूब

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  5. कोमल भाव लिए बहुत ही प्यारी रचना....
    दिल को छू लेनेवाली...
    :-)

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    1. शुक्रिया...रीना

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  6. आखिर तुमको भी वसंत याद आ ही गया....अच्‍छा है...।

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    1. दी..पुराना याराना है...बसंत से मेरा.

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  7. So beautiful Nidhi... और वो गीला सा सावन
    मेरी आँखों में रुक गया है

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    1. शैफाली .....आज तक रुका है

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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