Monday, May 27, 2013

तुम नाराज़ हो.....

तुम नाराज़ हो...
जब तक चाहो
नाराज़ हो लेना
पर,तुम
बस मेरी एक बात सुनना
चुप मत होना

नाराज़ हो
नाराज़गी जताओ
कहो सुनो
कुछ बोलो
जी भर चिल्लाओ.
चीख लो ..
जो मन में है
उसे कह जाओ

बस ...
अंदर ही अंदर मत घुटना
चुप मत होना .

मुझे सब है मंजूर
पर चुप्पी गवारा नहीं
तुम बोलते रहते हो
एक सुकून सा रहता है
जीवन रस बहता रहता है
वरना
जीवन जीना भारी ..
बस ,जैसे
मरने की तैयारी
ज़िंदगी तेरी चुप्पी से हारी .

10 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना
    सुंदर भाव
    कभी कभी ही ऐसी रचनाएं पढने को मिलती हैं

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  2. बहुत खूब ... प्रेम हो तो ऐसी चुप्पी को बर्दाश्त करना सच में मुश्किल होता है ...
    मन के भाव लिख दिए आपने ...

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  3. खूबसूरती से लिखे एहसास ।

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  4. सही कहा आपनी नारजगी बोलकर जताओ पर खामोश मत रहो .. क्या पता नारजगी ही खत्म हो जाए.....
    बहु त सुन्दर

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  5. कमाल है!
    चुन-चुन कर शब्दों का आपने प्रयोग किया और क्या सुंदर संदेश देती रचना है यह!!
    लाजवाब!!!

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