कुछ यूँ करते हैं कि
दीवारें जो उठ जाती हैं धीरे धीरे
...दिलों के बीच ...
चलते हैं साथ
उन दीवारों के पास
और जल्दी जल्दी
उन दीवारों को
हम मिल कर
आज गिराते हैं .
चलो......
मजदूर दिवस मनाते हैं .
ज़िन्दगी एक किताब सी है,जिसमें ढेरों किस्से-कहानियां हैं ............. इस किताब के कुछ पन्ने आंसुओं से भीगे हैं तो कुछ में,ख़ुशी मुस्कुराती है. ............प्यार है,गुस्सा है ,रूठना-मनाना है ,सुख-दुःख हैं,ख्वाब हैं,हकीकत भी है ...............हम सबके जीवन की किताब के पन्नों पर लिखी कुछ अनछुई इबारतों को पढने और अनकहे पहलुओं को समझने की एक कोशिश है ...............ज़िन्दगीनामा
चलो दीवार गिराते है.... मधुर भाव
ReplyDeleteदीवारें गिराने कि बढियां सोच... शेयर करने के लिए धन्यवाद :)
ReplyDelete-Abhijit (Reflections)
उन दीवारों को मिलकर गिराते है
ReplyDeleteचलो आज मजदूर दिवस मनाते है,,,
बहुत बेहतरीन सुंदर प्रस्तुति ,,,
RECENT POST: मधुशाला,
मजदूरों की सुनवाई कब होगी
ReplyDeleteउनका जीवन स्तर कब बदलेगा
आज तो बेमानी मजदूर दिवस
काश ये दीवारें उठाते ही नहीं ... उठाने के बड गिराना बहुत मुश्किल होता है ...
ReplyDeleteबदलाव आसानी से नहीं आता ,...
sunder...WAAH !!!
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