Monday, May 6, 2013

पता नहीं कब..?



कब जीना छोड़ दिया
कुछ याद नहीं पड़ता.
शुरुआती दौर में
ऐसा न था .
धीरे धीरे न जाने कब और क्यूँ
खुद को बदलती रही
सबकी मर्ज़ी से ढलती रही
सबने जैसा कहा
मैंने वैसा किया
सबको राजी रखने की
कोशिश मैं करती रही

मेरे आगे दूसरों ने
अपनी मर्ज़ी की लकीरें खींचीं
पता नहीं कब
वो लकीरों का जाल
न लांघें जाने वाली
दीवारों में बदल गया
सबके लिए करते हुए
मेरा मन कहीं मर गया

अब...
अपने में खुद मैं नहीं शेष
मुझे अपने ढूंढे नहीं मिलते अवशेष
हर मोड पर मिल जायेंगी
मेरी जैसी कई यहाँ
जिनका वजूद है उन लकीरों के सहारे
उबरना खुद है उन्हें अपने लिए
ज़िंदा नहीं रहना है केवल
जीना भी है अपने लिए .

11 comments:

  1. बहुत उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति,,,

    RECENT POST: दीदार होता है,

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  2. बहुत ही भावपूर्ण रचना.
    बहुत से स्त्रियों की यही स्थिति है..

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  3. स्त्रियाँ आधी उम्र खुद को खोने में बिताती हैं...फिर आधी वापस खोजने में....
    :-(

    बहुत अच्छी लगी रचना...
    अनु

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    Replies
    1. हाँ अनु...दिक्कत यही है

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  4. सुन्दर प्रस्तुति . बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

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  5. क्या बात है। सुंदर.. बहुत ही अच्छी रचना।

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  6. उत्साह जगाती एक अनुपम कृति.. ..देर से आने के लिए माफी....

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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