कब जीना छोड़ दिया
कुछ याद नहीं पड़ता.
शुरुआती दौर में
ऐसा न था .
धीरे धीरे न जाने कब और क्यूँ
खुद को बदलती रही
सबकी मर्ज़ी से ढलती रही
सबने जैसा कहा
मैंने वैसा किया
सबको राजी रखने की
कोशिश मैं करती रही
मेरे आगे दूसरों ने
अपनी मर्ज़ी की लकीरें खींचीं
पता नहीं कब
वो लकीरों का जाल
न लांघें जाने वाली
दीवारों में बदल गया
सबके लिए करते हुए
मेरा मन कहीं मर गया
अब...
अपने में खुद मैं नहीं शेष
मुझे अपने ढूंढे नहीं मिलते अवशेष
हर मोड पर मिल जायेंगी
मेरी जैसी कई यहाँ
जिनका वजूद है उन लकीरों के सहारे
उबरना खुद है उन्हें अपने लिए
ज़िंदा नहीं रहना है केवल
जीना भी है अपने लिए .
बहुत ही भावपूर्ण रचना.
ReplyDeleteबहुत से स्त्रियों की यही स्थिति है..
शुक्रिया!
Deleteस्त्रियाँ आधी उम्र खुद को खोने में बिताती हैं...फिर आधी वापस खोजने में....
ReplyDelete:-(
बहुत अच्छी लगी रचना...
अनु
हाँ अनु...दिक्कत यही है
Deleteसुन्दर प्रस्तुति . बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको
ReplyDeleteधन्यवाद!!
Deleteक्या बात है। सुंदर.. बहुत ही अच्छी रचना।
ReplyDeleteआभार!!
Deleteआभार!
ReplyDeleteउत्साह जगाती एक अनुपम कृति.. ..देर से आने के लिए माफी....
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