Tuesday, June 18, 2013

बादल


जब भी कभी

बादलों से बात हुई है.

उन्होंने यही कहा है ,हौले से

सफ़ेद रुई से हलके हम...

सबको नज़र आते हैं.

कोई नहीं समझता हमारा दर्द...

जब स्याह हो गहराता है.

तब ,बरसना हमारी खुशी नहीं..

तेरी मेरी दुआ का असर नहीं..

मोर की पुकार नहीं...

चकोर की प्यास नहीं..


बल्कि

अंतस की तकलीफ का बह जाना मात्र है.

19 comments:

  1. आह!!!
    बादलों का दर्द.....


    अनु

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  2. गहन ...बहुत सुन्दर ...मर्मस्पर्शी ...

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  3. बेहद सुन्दर प्रस्तुति ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (19 -06-2013) के तड़प जिंदगी की .....! चर्चा मंच अंक-1280 पर भी होगी!
    सादर...!
    शशि पुरवार

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    1. हार्दिक आभार,आपका.

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  4. बहुत सुन्दर कृति!...बधाई निधि जी!

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  5. बहुत सुन्दर गहन प्रस्तुति....

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    1. हार्दिक धन्यवाद!

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  6. बहुत खूब ... अंतस का दर्द बह जाए तो बादल छट जाते हैं ... ऐसे ही मन के दर्द भी मिट सकते बरसने पर तो जीवन हक हो जाए ...

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    1. बिलकुल,दिगंबर जी

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  7. सही कहा ....अंतस का दर्द उभर कर बाहर आना जरुरी भी है

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    1. अन्दर रह जाए तो नासूर बन जाए

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  8. Replies
    1. पसंद करने के लिए ,थैंक्स!

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  9. वाह.सुन्दर प्रभावशाली ,भावपूर्ण .बहुत बहुत बधाई...

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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