जब भी कभी
बादलों से बात हुई है.
उन्होंने यही कहा है ,हौले से
सफ़ेद रुई से हलके हम...
सबको नज़र आते हैं.
कोई नहीं समझता हमारा दर्द...
जब स्याह हो गहराता है.
तब ,बरसना हमारी खुशी नहीं..
तेरी मेरी दुआ का असर नहीं..
मोर की पुकार नहीं...
चकोर की प्यास नहीं..
बल्कि
अंतस की तकलीफ का बह जाना मात्र है.
बहुत उम्दा सुंदर रचना,,,
ReplyDeleteRECENT POST : तड़प,
शुक्रिया!
Deleteआह!!!
ReplyDeleteबादलों का दर्द.....
अनु
थैंक्स...अनु.
Deleteगहन ...बहुत सुन्दर ...मर्मस्पर्शी ...
ReplyDeleteदिली शुक्रिया!!
Deleteहार्दिक आभार,आपका.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर कृति!...बधाई निधि जी!
ReplyDeleteआभार।
Deleteबहुत सुन्दर गहन प्रस्तुति....
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद!
Deleteबहुत खूब ... अंतस का दर्द बह जाए तो बादल छट जाते हैं ... ऐसे ही मन के दर्द भी मिट सकते बरसने पर तो जीवन हक हो जाए ...
ReplyDeleteबिलकुल,दिगंबर जी
Deleteसही कहा ....अंतस का दर्द उभर कर बाहर आना जरुरी भी है
ReplyDeleteअन्दर रह जाए तो नासूर बन जाए
Deleteबहुत सुंदर भाव ।
ReplyDeleteपसंद करने के लिए ,थैंक्स!
Deleteवाह.सुन्दर प्रभावशाली ,भावपूर्ण .बहुत बहुत बधाई...
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