Friday, April 19, 2013

सप्पोर्ट सिस्टम


थक गयी हूँ
फासला तय करते -करते
जो आ गया हमारे बीच
एक फैसला करते करते .

ज़िंदगी....इतनी दुश्वार तो कभी न थी
जितना अब हो चली है
बड़े दिनों से
अपनी नज़रों से नज़रें भी मिलती नहीं .
तुम थे तो सब था
अब तेरे बिन कुछ भी नहीं
मेरा अपना वजूद ही नहीं

मेरा आप मुझसे सवाल करता है
एक नहीं कई बार करता है
कहाँ गया,क्यूँ गया वो ...
जो था मेरा ...सप्पोर्ट सिस्टम .

10 comments:

  1. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,,,
    निधि जी,,बहुत दिनों से नेरे पोस्ट पर नही आई,,आइये स्वागत है,,
    RECENT POST : प्यार में दर्द है,

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  2. अनुत्तरित रहने की स्थिति बहुत कठिन गुज़रती है.

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  3. मन को छूती पोस्‍ट ....
    आभार

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  4. आज की ब्लॉग बुलेटिन क्यों न जाए 'ज़ौक़' अब दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. सार्थक प्रस्तुति। धन्यवाद।

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  6. मन को कहीं हल्के से छू गयी .....

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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