Saturday, March 16, 2013

रंगीला बसंत


तेरी यादों की बालियाँ
पक गयी हैं
लहलहाने लगी हैं.
आम पर लद रही है बौर
जैसे संग है मेरा दर्द
मुझे महकाता हुआ .
अलसी के फूलों ने
ले लिया है नीलापन
मेरी हर अंदरूनी चोट से.
सरसों ने उधारी पर लिया है
थोड़ा पीलापन
मेरे ज़र्द चेहरे से
पर ...मज़े की बात है कि
इस सब के बीच में ही
फूल रहा है हमारा प्यार
पलाश सा दहकता हुआ लाल .
कितना रंगीन होता है न बसंत...!!

14 comments:

  1. अद्भुत ....बहुत सुन्दर कृति आपकी ....

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  2. बेहतरीन प्रस्तुति,आभार.

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-03-2013) के चर्चा मंच 1186 पर भी होगी. सूचनार्थ

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    1. आभार...मेरी रचना को शामिल करने के लिए

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  4. "बहुत सुन्दर एहसास प्यार का"

    मेरे ब्लॉग का अनुशरण करें ख़ुशी होगी
    latest postऋण उतार!

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  5. बहुत क्ल्हूब ... ये पलाश यूं ही महकता रहे ... ये बसंत कभी खत्म न हो ...
    सुन्दर एहसास लिए रचना .....

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  6. वाह, क्या रंगों की बौछार करके दिल की आवाज़ चंद से लफ़्जो मैं छुपा ली ......दर्द (भी)...महकाता हुवा .....चोट का नीलापन .....ज़र्द चहेरे का पीलापन .....अपना बसंत कितना रंगीन बना लिया है अपने पलाश सा दहकता हुवा लाल प्यार संग ........! क्या रंग पकडे है लाल ,नीला और पिला ...जिसमे सारे रंग छिपे हुवे है !!!!!!!!!!!!

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  7. इन सबके पलाश- सा दहकता हमारा प्रेम ...
    बहुत बढ़िया!

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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