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Thursday, September 13, 2012

तुम पागल हो




कितना कुछ कहना था
कब से रुका हुआ था
अंदर दबा हुआ सा था
मन पे एक बोझा था
अकेले सहना मुश्किल था .
अब.....
सब बह गया है..
उतर गया है सब.

पाँव ज़मीन पे नहीं रहते
दिल उड़ने को करता है
तुमसे मिलने को करता है
सब कुछ तुम्हें दे कर
तुम्हें पा लेने को करता है
अजीब सा हो गया है कुछ
हर घडी न जाने क्या-क्या
ये जी करता है .
कुछ समझ नही आ रहा
किस राह जाने की
तैयारी है इसकी .

जुडना...
तुम्हारे हर सुख ...हर दुःख से
सुनना ...
बातें तुम्हारी कही-अनकही सी
रहना...
तुम्हारे ख़्वाब और ख्यालों में
चाहना...
तुम्हारा प्यार...तुम्हारा विश्वास
मांगना...
तुम्हारा साथ दिन रात
सच कहूँ ,तो.......

रास आ रहा है ये पागलपन मुझे
कि तुम्हारे मुंह से
"तुम पागल हो "सुनना अच्छा लगता है

Wednesday, August 15, 2012

आज़ादी दिवस



एक पागल है ..
सारे शहर में घूम घूम के
हरसिंगार के झरे फूल और गिरी पत्तियां
इकट्ठी करता है .

सुना है...
वक्त का है मारा
फ़ौजी है पुराना
इन फूल पत्तियों में
उसे...



अपना तिरंगा नज़र आता है .
जिससे हर शख्स बेखबर नज़र आता है .
अपने देश की स्थिति दिखायी देती है .
बात-बात पे उसकी आँख भर आती है .

देश के लिए कुछ करने..देश को कुछ दे पाने का पागलपन हम पे भी हावी हो जाए .
आज़ादी दिवस आप सभी को मुबारक हो !!

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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