Wednesday, April 25, 2012

दोष नियति का क्यूँ??????????


अनदेखे आसमान अपनी ओर यूँ खींचते हैं ..कभी-कभार
कि सुन नहीं पाते,हम
धरती की पुकार...महसूस नहीं कर पाते उसका प्यार
जो कहती है....रुक जाओ!! मत जाओ .
रिश्ते का गला घोंट के मारने से लेकर
ताबूत में कीलें लगा कर
उसके गाड़ने तक
हम नियति को दोषी नहीं ठहरा सकते
दोष ...अपना है
नितांत अपना
क्यूँ अपना किया
किसी और के सर डालने का एक और पाप लिया जाए .
यह नियति हमारी ....जो है ,जो हुई
उसके कारण भी हम है .
कभी ना कह पाना ..
ना सह पाना ..
अनदेखे डरों से डरते जाना ...
ले गया अपने साथ खुशनसीबी हमारी .
आज.
राहें हैं जुदा-जुदा हमारी .

22 comments:

  1. टूटे या जुड़े - कसूर अपना ही तो है

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    1. कसूर अपना ही होता है...कमोबेश.

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

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  3. बेहतरीन भाव संयोजन किए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  4. सुंदर भाव ...गहन अभिव्यक्ति

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    1. हार्दिक धन्यवाद!!

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  5. रचना का शीर्षक पूरी रचना पर छाया हुआ है कविता की प्रत्येक पंक्ति में अत्यंत सुंदर भाव हैं.....सुन्दर कविता...निधि जी

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    1. तहे दिल से शुक्रिया!!

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  6. कभी ना कह पाना ..
    ना सह पाना ..
    अनदेखे डरों से डरते जाना ...
    ले गया अपने साथ खुशनसीबी हमारी .
    आज.
    राहें हैं जुदा-जुदा हमारी .

    Nidhi...chand panktiyon ne saara dard udhel diya! Sach, kasoor hamara hi hota hai, kabhi shabd nahi hote, kabhi mauka aur kabhi himmat! kaash, aisa ho ki is janmo ki galtiyon ko agle janm mei sudharne ka mauka mil jaye!

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    1. शेफाली...अक्सर ,हम खुद ही दोषी होते हैं....अपने को उस दोष से मुक्त करने के लिए हम भाग्य का सहारा ले लेते हैं.समाज का...परिवार का..न सुनने का पता नहीं कौन कौन से डरों के कारण ..वो कह नहीं पाते,कर नहीं पाते जो वास्तव में चाहते हैं .फिर बाक़ी ज़िंदगी अफ़सोस में गुजारते हैं कि...काश.............

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  7. आत्म-मंथन करती बेहतरीन रचना ! बधाई !

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    1. आपका हार्दिक धन्यवाद.

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  8. कभी ना कह पाना,ना सह पाना ,अनदेखे डरों से डरते जाना !!यही वो सच है जो चीन लेता है ,सबसे अपनी अपनी ख़ुशी | आपकी कविता ने इसे बखूबी बताया |

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    1. आपकी वाली बात..हमेशा लीक पे ..तकनीक से खेलने की कोई ज़रूरत नहीं होती ...दीपक जी

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  9. धरती और आसमान के बीच
    क्षितिज की व्यथा भोगने की नियति को
    तुमने खुद चुना .....
    खींचती तो है धरती तुम्हें ...
    आसमान पा लेने की ताकत भी है तुममे ...
    पर सब कुछ तो नहीं मिलता न ..
    या छोड़ दो हाथ धरती का
    उड़ जाओ आसमान के विस्तार में
    या लौट आओ
    धरती इंतज़ार में है
    आज भी ..........

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    1. तूलिका...धरती भले इंतज़ार में हो....पर धरती पे जिसका इंतज़ार मुझे है...वो मेरे इंतज़ार में कहाँ?सब कुछ नहीं मिलता...किसने चाहा ..सब कुछ .मुझे कुछ ही मिल जाता..पर मेरे मन मुताबिक़.

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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