Saturday, April 14, 2012

स्क्रीचिंग हाल्ट


मेरे आज में क्यूँ चले आते हो?
बोलो ?
कितना ही मना करूँ
फिर भी चले ही आते हो?
इस तरह तुम्हारा आना
चाहें वो यादों में हो..
या फिर ख़्वाबों ,ख्यालों में
मेरी ज़िंदगी को ....
...................
स्क्रीचिंग हाल्ट पे ले आता है.
बीते हुए कल और आज में एक्सीडेंट न हो
उसके लिए ,
मुझे कितनी जोर से ब्रेक लगाने पड़ते हैं
दिल उछल कर जैसे हाथों में आ जाता है
छोडो ..तुम कभी नहीं समझोगे ...

बाज आओ ...अब तो...
मत आओ न ...मेरे पास
मेरी सोच से भी दूर चले जाओ न

31 comments:

  1. बाज आओ ...अब तो...
    मत आओ न ...मेरे पास
    मेरी सोच से भी दूर चले जाओ न

    बहुत सुंदर रचना...बेहतरीन पोस्ट
    .
    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

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  2. तहे दिल से शुक्रिया!!

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  3. यादों के साये से निकालना ज़रूरी है वरना सावधानी हटी दुर्घटना घटी....

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    1. यह दुर्घटना आय दिन घटती ही रहती है.

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  4. इस तरह तुम्हारा आना
    चाहें वो यादों में हो..
    या फिर ख़्वाबों ,ख्यालों में
    मेरी ज़िंदगी को ....
    ...................
    स्क्रीचिंग हाल्ट पे ले आता है.

    सुंदर शब्द संयोजन...

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  5. सही चित्रण मुझे तो यह कविता सच्चाई के बहुत क़रीब लगी....निधि जी

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    1. दिल से लिखती हूँ...इसलिए सच्चा ही लिख पाती हूँ.

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  6. छोडो ..तुम कभी नहीं समझोगे ...सारे भाव इसी में निहित हैं

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    1. यह उलाहना भर है...

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  7. मेरी सोच से भी दूर चले जाओ न....

    सम्भव है...???

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    1. इसका उत्तर हम सबको पता है कि.... यह संभव नहीं

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  8. बहुत खूब ... पर शायद वो नहीं आते .. उनकी यादें बरबस चली आती हैं अपने मन के ही किसी कोने से ...

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    1. हार्दिक धन्यवाद!!पसंद करने के लिए.

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  9. मन पर स्क्रीचिंग हाल्ट के निशान आ जाते हैं. कविता सुंदर तरीके से भाव को व्यक्त करती है.

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    1. आपकी सराहना हेतु ,आभार!

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  10. मुझे कितनी जोर से ब्रेक लगाने पड़ते हैं
    दिल उछल कर जैसे हाथों में आ जाता है
    छोडो ..तुम कभी नहीं समझोगे ..

    ...सच कुछ लोगों की फितरत कभी नहीं बदलती..

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    1. कुछ लोगों की फितरत कभी नहीं बदलती.....सच.

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  11. bilkul sabke zindagi k kareeb lagti hai aapki ye rachna....shayad sabka sach bhi ham use mane ya nkar den ,par dil ko chhuti hui rachna hai .......

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    1. आपको रचना अच्छी लगी ...मेरा सौभाग्य है.

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  12. चरफर चर्चा चल रही, मचता मंच धमाल |
    बढ़िया प्रस्तुति आपकी, करती यहाँ कमाल ||

    बुधवारीय चर्चा-मंच
    charchamanch.blogspot.com

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    1. हार्दिक धन्यवाद!!

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  13. ब्रेक मत लगाया करो
    गाड़ी सड़क के किनारे
    थोड़ी देर ले जाया करो
    जब निकल जाये वो
    उसकी गाड़ी के पीछे
    हो जाया करो ।

    ़़़़
    बहुत खूबसूरत रचना !!!

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    1. ऐसा संभव होगा क्या ?सामने से कोई अचानक आए तो ब्रेक तो बनता है..एक्सीडेंट से बचने के लिए

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  14. जब तक संबंध हैं,तभी तक दुनिया है। वे न रहे,तो दुनिया भी बेमानी होगी।

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  15. बीते हुए कल और आज में एक्सीडेंट न हो
    उसके लिए ,
    मुझे कितनी जोर से ब्रेक लगाने पड़ते हैं
    दिल उछल कर जैसे हाथों में आ जाता है

    ....बहुत सच कहा है....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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    1. आपका शुक्रिया...रचना को पसंद करने के लिए .

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  16. शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम है।

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  17. अर्चना पंतApril 23, 2012 at 1:38 AM

    निधि .... कह भी रही हो.. और जानती भी हो कि वो जिसे उलाहना दे रही हो आने की.....
    वो कभी गया ही नहीं था कहीं !

    वो तो तिरता ही रहा सदा , साँसों में..... धमनियों में ....स्पंदन में....प्राणों में !.....
    सुबह की लाली उसीका रंग लेके आती है.......साँझ का धुन्धलका उसीके प्रेम में गहराता है..... .रात की कालिमा उसकी प्रीत में और प्रगाढ़ होती है !.....
    हवाएँ जब सरसराती हैं ....तो उसीके स्पर्श का उन्माद होता है ....
    मौसम जब संवरतें हैं....तो वो ही शिराओं में नए गीत गुनगुनाता है प्रणय के .....

    नहीं ! वो तो कभी , कहीं गया ही नहीं.....जो लौट के आएगा ...
    ये तो इक हूक है जो उठती है प्राणों की गुहा से कहीं...
    एक कसक ...एक शूल सी बीते पलों के लिए......एक आदिम आर्तनाद भर !

    और इस आर्तनाद को रोकना असाध्य है......
    क्योंकि ये कभी द्वार पे दस्तक दे कर नहीं आता !....
    अनुमति लेकर भी नहीं आता कभी .....ज़रुरत ही कहाँ है ?
    ये तो चला आता है मन के किसी भूले से रोशनदान से.....आस की खिड़की ...... अभीप्सा के दरवाजों की अनदेखी दरारों से ...
    ये आता है अनायास ...अनपेक्षित....अयाचित ....साधिकार !

    फिर आप चाहे ' स्क्रीचिंग हॉल्ट ' लगायें....ब्रेक लगायें.....चाहे आपका दिल उछल कर हाथों में ही क्यों न आ जाए....कोई फ़र्क नहीं पड़ता !
    इश्क़ का मुंसिफ़ बड़ा ज़ालिम है....
    अपना सूद लिए बगैर वो छोडनेवाला भी नहीं !
    मिर्ज़ा ग़ालिब आख़िर यूँ ही तो नहीं फ़रमा गए ......

    "ऐसा आसां नहीं लहू रोना
    दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ ..."

    ह्रदय वेधी कृति निधि !......
    दिल सचमुच उछल के हाथ में आ गया !

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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