Tuesday, June 14, 2011

रिश्तों के लिए ताबूत

कभी कभार.............
या सच कहूँ तो ..........
अब अक्सर ही
यूँ लगता है कि
दूरियां बढ़ रही है हमारे बीच.
कारण ढूंढो तो ढूंढें नहीं मिलता है.
क्या हो गया है????????
कहाँ से यह अजनबीपन??????
हमारे इस रिश्ते में अपनी पैठ बनाने लगा है.
जब भी कभी मिलते हैं
एक औपचारिकता की चादर ओढ़े रहते हैं
कुछ पल बोल कर, एक लंबी चुप्पी से घिर जाते हैं
घंटों बतियाना अब मुमकिन नहीं होता
मसरूफियत इतनी कि एक घर में रहते हुए भी...........
...........महीनों मिलना नहीं होता
फोन पर बात ज़रा लंबी हो जाए ....
तो , बेवकूफी लगने  लगती है .

जो चीज़ें साथ करते थे कभी
वो सब अपने 'स्पेस 'के लिए
और दूसरे को ' स्पेस ' देने के चक्कर में
.....भूल ही चुके हैं ....


शायद,रिश्तों को लगातार सींचना होता है
......जिंदा रखने के लिए
बातों का रस,मिलन की खाद और प्यार की धूप
सब ज़रूरी हैं
जबकि हम लोग करते उसका बिलकुल उल्टा हैं
उस अनकहे में
चुप्पी की कीलें लगा कर
रिश्तों के लिए ताबूत बनाते हैं
और अपने अहम की कुदाल से
रोज उसकी कब्र खोदते हुए
ज़िंदगी बिताते हैं

25 comments:

  1. rishte lagataar sinchan chahte hain , chhota sa shabd hi sahi .... sunna chahte hain , ek halki muskaan khud ke liye dekhna chahte hain

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  2. rachnayen aamantrit hain .... apni aprakashit 4 5 rachnayen bhejen

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  3. उस अनकहे में
    चुप्पी की कीलें लगा कर
    रिश्तों के लिए ताबूत बनाते हैं
    और अपने अहम की कुदाल से
    रोज उसकी कब्र खोदते हुए
    ज़िंदगी बिताते हैं
    रिश्तों को सींचने के लिए वार्तालाप ज़रूरी है ... सटीक अभिव्यक्ति

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  4. o निधि, जो आपने लिखा यह भी जीवन की एक सचाई है , उसके लिए जो इससे गुजरा है ! जैसे रिश्ते जब बनते है तो असीम खुशियाँ देते है इसी तरह से जब इनमें बिखराव आता है तो दर्द भी असीम होता है , जो शायद बयाँ करना और किसी दुसरे के लिए समझना बहुत मुश्किल होता है


    रिश्ते जब धीरे धीरे बिखराव पर आते है तो दीमक की तरह आपके अन्दर को खोखला करते चले जाते है , और फिर एक छुपी अख्तियार कर लेते है , और यही छुपी रिश्तों में दूरियां बढाती जाती है और दिल कह उठता है


    उसको गिला रहा के तवाजो ना दी उसे
    लेकिन हमे खुद अपनी रफ्फकात नहीं मिली


    और जब एक बार रिश्तों में गाँठ बांध जाये तो फिर जैसा आपने लिखा
    उस अनकहे में
    चुपी की कीले लगा कर
    रिश्तों के लिए ताबूत बनाते है
    और अपना हम की कुदाल से
    रोज उसकी कब्र खोदते हुए
    जिंदगी गुजरते है



    इस पर मुजहे गुलज़ार साहब की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है


    मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे,
    मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता, लेकिन मेंरे उस ताने की सारी गिरहे साफ़ नज़र आती है मेरे यार जुलाहे
    लेकिन तेरे उस ताने में कोई गाँठ गिरह बुनतर की देख नहीं सकता है कोई यार जुलाहे..
    मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे..



    लेकिन इन दूरियों को पाटने की जिमेदारी भी तो हमारी ही बनती है

    कुछ अपनी कहो कुछ मेरी सुनो
    सिलसिला बातों का चले तो कुछ बात से बात बने

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  5. nidhi .....u hav so wonderfully potrayed d very facts of life .....of 2 pple who r said 2 be soulmates ......but end up being .......2 different souls who hav no choice but 2 spend their life under 1 roof...............awesum as always !!:)

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  6. that was very thoughtful..
    very well written. You've pointed the basic problem in families we are facing today.

    It was a nice read.

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  7. निधि जी, रिश्तों के सन्दर्भ मैं एक बहुत ही सुन्दर रचना... बहुत ही सुन्दर शब्दों में आज की हकीकत का वर्णन...
    बधाई आपको...

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  8. किरण............आप तो क्या लिखती हैं ,आजकल.गज़ब !!!!मेरी रचना के मर्म को जिसे कायदे से समझना हो वो आपका कमेन्ट पढ़ ले तो उसे हरेक बात कायदे से समझ आ जायेगी..........मेरी रचना को आपने बढ़िया ढंग से जैसे पुनः व्याख्यायित कर दिया है.......बहुत शुक्रिया ..........
    आपने बिलकुल सही फरमाया है कि बहुत खलता है जब किसी की नज़र में हम used to be हो जाते हैं

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  9. विनय जी..........शुक्रिया.आपकी बधाई और प्रशंसा को मैंने समेट एवं सहेज लिया है

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  10. रश्मिप्रभा जी ...धन्यवाद!पोस्ट को पढ़ने के लिए ....टिप्पणी करने के लिए !

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  11. संगीता जी......सच में किसी भी रिश्ते के लिए वार्तालाप बहुत ज़रूरी है

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  12. गुंजन.................मेरा सोचा,कहा,लिखा सबको अगर लगता है कि उन्होंने भी ऐसा होते देखा है या ...ऐसा उनके साथ हुआ है.......मतलब किसी भी तरह जुड़ाव पैदा करता है तो मेरा लिखना सार्थक हो जाता है .

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  13. ज्योति जी..............आपका शुक्रिया कि आपने रचना को पढ़ा एवं सराहा

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  14. अर्थिजा........पसंद करने के लिए ,आभार .

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  15. वाकई बहुत सुदर रचना है। जो भी पढेगा, लगता है कि उसी के इर्द गिर्ध कविता घूम रही है।

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  16. धन्यवाद.....महेंद्र जी...........आपकी प्रशंसा एवं टिप्पणी हेतु

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  17. ... इस बेहतरीन रचना के लिए 'निधि' आपको फिर धन्यवाद... आपने सही कहा 'स्पेस' देने के चक्कर 'रिश्ते' मायने खोते जा रहे है.... "रिश्तों के बीच 'स्पेस' देना" ये जुमला पिछले कुछ वर्षों से बहुत प्रचलित हो गया है.... आपने बाखूबी से रिश्तों में आ रहे बदलाव को खूबसूरती से बयाँ किया है.. इस सन्दर्भ में पिछले दिनों लिखे कुछ शेर जहन में आ रहे है..

    मैं पूछूं और तुम मुकर जाओ तो बुरा लगता है
    रूठूँ मैं और तुम न मनाओ तो बुरा लगता है

    दूरियों में गुजरी तमाम उम्र इसका गिला नहीं
    करीब आकर गर गुज़र जाओ तो बुरा लगता है

    चुन कर ज़माने में जो सिर्फ तुमको दिया है
    और तुम वो 'हक' भी न जताओ तो बुरा लगता है

    तरसती रही नज़र जिस एक नज़र की खातिर
    बेसबब मुझसे वो नज़रे चुराओ तो बुरा लगता है

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  18. Mohammad ShahabuddinJune 16, 2011 at 7:15 PM

    तुझको पाना तो मुक्कदर था ,
    तुझको खोना भी नसीब है ,
    हम दोनों को जीना है जबकि ,
    रिश्ते की सर पर सलीब है .

    न कोई खता तुम्हारी है ,
    न मेरी गलती है कोई ,
    रिश्ते की उम्र ही छोटी थी ,
    और हम भी कुछ बदनसीब है .
    तुझको पाना तो मुक्कदर था ,
    तुझको खोना भी नसीब है .....निधि ..... सच रिश्तों को जो हम जीने के बजाये औपचारिकता निभा रहे हैं, इसलिए जीवन में रिश्ते कम निभा पा रहे हैं....बहुत अच्छा लिखा है तुमने....

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  19. शायद रिश्तों को लगातार सींचना होता है
    ज़िंदा रखने के लिए ......

    एहसास की अवहेलना को
    दिए गए कुछ
    सार्थक शब्द
    अच्छी कृति !!

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  20. अमित...आपने जो शेर लिखे बहुत अच्छे बन पड़े हैं......सच ,ये स्पेस वाला जुमला आजकल बहुतायत से इस्तेमाल हो रहा है ...जब तक एहसास होता है कि स्पेस की हद क्या हो तब तक अक्सर रिश्तों में बहुत दूरी आ गयी होती है .पोस्ट को लाइक करने के लिए शुक्रिया..

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  21. दानिश जी............आपको रचना पसंद आयी....मेरा लिखना सार्थक हो गया ...आभार!!

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  22. MS..............आपकी टिपण्णी पढ़ी.........अच्छा लिखा है आपने......रिश्तों की अहमियत ही समझना बंद कर दी जाये तो वो कहाँ बचेंगे ?वाकई ,रिश्तों के सर पर सलीब है ,आजकल.

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  23. निधि जी आज की हकीकत का वर्णन...

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  24. संजय जी...यह हकीकत तो है............पर बड़ी कड़वी है...हरेक सच्चाई की तरह !

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