Monday, March 28, 2011

क्रिया और प्रतिक्रिया का सिद्धांत ..........

क्रिया और प्रतिक्रिया का सिद्धांत ..........
इस सिद्धांत को मैंने भी पढ़ा था
जैसे,
आम विद्यार्थी नंबरों के लिए बहुत कुछ पढ़ लेता है 
लेकिन ,आज जा कर ........
यह सिद्धांत समझ में आया है   
जब  ,
तुम्हारे चले जाने के बाद   
मैंने,बलपूर्वक   
तुम्हारी यादें ,तुमसे जुडी सारी बातें   
दिल में दबाने की  
और
आँखों  में अश्कों  को संभालने की कोशिश करी    .
मैं,
नाकामयाब रही 
क्यूंकि  
क्रिया की प्रतिक्रिया हुई 
जितना जोर मैंने गुज़रे पलों   को भूलने में लगाया

बीते पलों ने उतना ही  ज़्यादा मुझे सताया
जब-जब तुम्हारी याद के उस  दर्द  को सीने  में दफनाया
कहर ढाने वो  बार  -बार लौट  आया
आंसुओं  को आँखों के जेल  में कैद करना चाहा  
वो सैलाब बनकर सारे बंधन तोड़ आया
अब तुम्ही बता दो ,मैं क्या करूँ  ?
कैसे तुम्हे भूलूं  ,न  याद
करूँ  ?
भूलने की कोशिश  में दुगना  याद  करने  लग  जाती  हूँ 
दूर जाने के प्रयास में विफल हो तुम्हें,अपने और करीब पाती हूँ

4 comments:

  1. @ निधि .......... बहुत ही दिल को छूने वाली कविता !........ऐसी अन्छूई अनुभूतियों का वर्णन ; जिन्हें केवल उन्हें भोगने वाला ही समझ सकता है !!!........प्रेम में मिली पीड़ा की अकथ त्रासदी !!!.......क्रिया -प्रतिक्रया का मूलभूत सिद्धांत ........वो जो हमने विज्ञान की किताबों में पढ़ा और बंद कर के भूल गये थे .....अचानक किसी उद्दंड बालक की तरह मुहं चिढाता हुआ सामने आ कर अनायास ही खडा हो जाता है...........मानो कह रहा हो......लो अब भूल के दिखाओ मुझको !!!......सच में......विरह की पीड़ा .....अवहेलना का दुरूह कष्ट ......विस्मृती का दंश .....वियोग की यंत्रणा ....जो किसी ने झेली हो वही जानता है की अपने भीतर सब दबाने के असफल उपक्रम की व्यथा क्या होती है !!!.............कैसे अनचाहे ही आंसुओं की बरखा मन की सारी वेदना को क्षण भर में अनावृत्त कर देती है !!!...........अपने को छलना इतना आसान नहीं होता !!!....... वो सब जो हम अपने से भी छिपा जाते हैं ....हमारी छाया बन कर हमारे साथ साथ चलता है ....बस हम ही उसे देख नहीं पाते !!!........और वही होता है जो तुमने कहा की......" भूलने की कोशिश में दुगना याद करने लग जाती हूँ ....दूर जाने के प्रयास में विफल हो तुम्हें , अपने और करीब पाती हूँ !!! ".......बहुत ही सच्ची और सुंदर कृति .............तुमने एक बार फिर अभिभूत कर दिया !!!

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  2. निधि टंडनApril 4, 2011 at 8:29 AM

    अर्ची दी,आपकी प्रतिक्रिया पढ़ने के उपरान्त सदा ही ह्रदय प्रसन्न हो जाता है......आप जब भी लिखती हैं तो लगता है की व्यक्ति ने आद्योप्रांत पढ़ने के बाद ही अपनी टिप्पणी दी है ...........प्रत्येक भाव की व्याख्या इतने सुन्दर शब्द संयोजन के साथ करने की क्षमता आप में ही है ...........अपने को छलना आसान नहीं वरन असम्भव सा ही होता है...............समस्त जग को आप छलते रहते हैं परन्तु अपने अंतस में आप जानते हैं की सच क्या है............

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  3. @निधि ....
    न्यूटन के 'क्रिया प्रतिक्रिया' संबंधी इस 'भौतिकी के सिद्धांत' पर आपकी ये विवेचना सराहनीय है .....

    'क्रिया प्रतिक्रिया' के इस सिद्धांत को 'विरह वेदना' से जोड़ना केवल 'निधि' की 'कल्पना क्षमता' और 'काव्य सामर्य्थ' को दर्शाता है ...

    'निधि' आपके कविता में इन नए प्रयोगों का मैं कायल हूँ .....
    ..............................
    महसूस किया है मैंने की और करीब आ गया
    जब भी करी कोशिश मैंने तुझसे दूर जाने की


    @अर्चना जी ... आपके कमेंट्स पढ़ने का आनंद ही कुछ और है

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  4. निधि टंडनApril 4, 2011 at 11:59 PM

    अमित,मेरी इतनी प्रशंसा करने के लिए आपकी आभारी हूँ..........हाँ,यह प्रयोग या कह लीजिए जो साम्य इस कविता में दर्शाया गया है वह नवीनता लिए हुए है.............भौतिकी के सिद्धांत मुझे कभी नहीं रुचे उसी का फल है की साइंस छोड़ कर आर्ट्स लेनी पड़ी थी .......चलिए,कम से कम यहाँ सिद्धांतों की व्याख्या मैं अपनी तरह करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हूँ.
    अमित..........आपका लिखा शेर खूबसूरत है

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