
जैसे ,
जलती हुई आग पर एकाएक पानी पड़ जाना
मद्धम-मद्धम बहती हवा का एकदम से रुक जाना
हँसते-हँसते अश्कों का बेबात छलक जाना
चमकते सूरज के आगे बदली का छा जाना
सुरीले गीत का एक ही पल में बेसुरा हो जाना
सुबह का कोई हसीं सपना अधूरा रह जाना
किसी कश्ती का किनारे पे आकर डूब जाना
... मिलन के बाद जुदाई की पीड़ा... जुदाई के बाद मिलन का आनंद ... का वर्णन शादो में उतारना मुश्किल होता है..... पर निधि आपने अपने अहसासों को बहुत खूबसूरती से संवारा है... आपको बधाई ....
ReplyDeleteनिधि : हर उस पहलू पर जो ज़िन्दगी में गुज़रते हैं तुम बखूबी लिखती हो …सबसे ज्यादा हुनर वाली बात है जो उस हालात को तुम किसी और से मुकाबला करती हो , वो काबिले -तारीफ है …बड़ा मुश्किल सफ़र होता है मिल कर बिछड़ना ….ज़िन्दगी में कभी करीब आये और फिर दूर चले जाए बड़ी तकलीफ होती है ….तुम्हारे इस उपमा से मुझे जगजीत सिंह , चित्रा सिंह की वो ग़ज़ल याद आ जाती है ...
ReplyDelete“मिलकर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम
एक दूसरे की याद में रोया करेंगे हम
आंसू छलक छलक के सतायेंगे रात भर
मोती पलक पलक में पिरोया करेंगे हम ..”
हमारा ख्याल कुछ इस तरह से है....
मिलना और बिछड़ना तो किस्मत का खेल है ...
अंजाम कुछ भी हो कोई ग़म नहीं...
पर मोहब्बत की इस दुनिया में कभी रुसवाई न हो....
खुश रहिये हमेशा ...
अमित..............आपकी बधाई स्वीकार करती हूँ ............आपको एहसासों का शब्दों में वर्णन अच्छा लगा........मेरा प्रयास सार्थक हो गया ......शुक्रिया
ReplyDeleteMS.................आपकी तारीफ का बहुत शुक्रिया .............सच कहा आपने कि मिल के बिछड़ने का सफ़र बहुत मुश्किल होता है...........मिलन का वक़्त जितनी जल्दी गुज़र जाता है उतना ही कठिन और लम्बा होता है जुदाई की पीड़ा और समय.........
ReplyDeleteनिधि ...मिलन के बाद का वियोग निश्चित ही एक बहुत कष्टकर अनुभव है !.....यूँ देखा जाए तो हर बिछोह किसी न किसी मिलन के बाद की ही परिणिती है ......अतः वेदना तो फिर उतनी ही तीव्र होती होगी !......गोकि मानती हूँ...जिस जुदाई कि बात तुम कर रही हो वो उस दूरी कि बात है , जो प्रीति के अतिरेक के बाद हो जाए !!!........उस की पीड़ा निश्चित ही असह्य्य होती है !....... अधिक स्नेह भी श्राप हो जाता है........ जिसका दंश सच , बहुत यातना देता है !!!.....जैसे किसी वीणा के मोहक संगीत में अचानक व्यव्धान पड़ जाए.......बीच गीत में कोई तार टूट जाए !........ जैसे कोई मधुर स्वप्न के बीच अचानक उठा दे .....कैसा मोह - भंग होता है ना !!.........जैसे नाचते नाचते पैरों में कोई काँटा चुभ जाए.....और हम तिलमिला के बस वहीं बैठ जाएँ !!!.........जैसे हँसते हँसते आँखें भर आयें...........हाँ ठीक वही अनुभूति जो सहसा बदली हट जाने और चिलचिलाती धूप पड़ने पर होती है.........बड़ी असहायता की !.....पीड़ा की !!.....कष्ट की !!!.........जैसे कोई पैरों के नीचे से धरती हटा दे....और हमारा सारा आश्रय ....सारा संबल धाराशायी हो जाए !....हम असहाय ....निरीह ....अनाश्रित से एकटक देखते रह जाएँ !!!..........जैसे कोई हमारी सांस रोक दे........और हमें एक अजीब सी छटपटाहट ......एक अकथ यंत्रणा हो !!!...........बस वही अनुभूति होती है.....मिलन के बाद वियोग की !!!..........
ReplyDelete......तुम्हारी लेखनी के बारे में तो क्या कहूं........तुम उन भावों को जीवंत कर देती हो.....जो कभी बहुत अंतस में उठे ज़रूर हैं....पर हमने स्वयं भी उनको पहचाना नहीं !!!........उन जानी - अनजानी सभी अनुभूतियों को सामने प्रस्तुत कर देती हो...........और सच कहूं तो में अवाक रह जाती हूँ !!!.....
बस ये सिलसिला यूँ ही बनाए रखो !!!
अर्ची दी........आपको रचना पसंद आई............आभार.दी आपका यह आशीर्वाद सदा यूँ ही मुझ पर बना रहेगा तो लिखने का यह सिलसिला भी यूँ ही चलता रहेगा...........मोह-भंग होना ही तो इस जीवन का सबसे बड़ा दंश होता है.......फिर यह किसी भी परस्थिति में,किसी कारण से हो और किसी के भी साथ हो........जिसे आप चाहें ,उसके मिलन के बाद की जुदाई कितनी असहनीय होती है ये वही समझ सकता है जिसने कभी किसी को चाहा हो .........
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