Saturday, March 5, 2011

तुम्हारे वादे

तुम्हारे वादे,तुम्हारी कसमें
झूठ या कह लो सच का छलावा
एक पल हैं तो दूजे पल नहीं
जैसे................
जाते हुए वक़्त की पुकार
सावन के महीने में बादल का आकार
पानी पर खिंची रेखा
क्षितिज पर फैला धोखा
धूप  निकलने पर ओस की बूँद
जंगल में फैली अनसुनी गूँज
या कच्ची नींद का सपना
झूठा होकर भी लगे अपना

8 comments:

  1. Mohammad ShahabuddinMarch 5, 2011 at 12:26 PM

    Nidhi: Tumhare vaade ke lekh par mujhe Daag sahab ke ghaal se chand sher yaad aa gaye..
    Gazab kiyaa, tere vaade pe aitabaar kiyaa
    tamaam raat qayaamat kaa i.ntezaar kiyaa

    ha.Nsaa ha.Nsaa ke shab-e-vasl ashk-baar kiyaa
    tasalliyaa.N mujhe de-de ke beqaraar kiyaa..
    Bahut accha likha hai...

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  2. शुक्रिया..........MS!चलिए मेरा कुछ पढ़ कर आपको इतने महान शायर के शेर याद आ गए ..............मेरे लिए यही बहुत है..........की आपको अच्छा लगा

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  3. Nidhi....Ye woh kavitaa jissae padh kar man nahin bharnae waalaa.....padh rahae hein.....baar baar ..phir baar baar....phir bar baar !!!.....kitnae sunder....nayae bimb !!!....jaisae dhaeron choodiyaan ekaa-ek saath mein khanak jaayein !.....man mein koi jaltarang bajaa dae !!!......" Paani par khicheen rekha ...kshitij par failaa dhokha....dhoop nikalnae par os kee boond.....jungle mein failee ansunee goonj ....."...aur un waadon kee upmaa iss sae baehter ho bhi kyaa saktee hai !!!....Woh jo prati pal chchaltae hein !....vyaamohon sae lubhaatae hein !!.....mrigg trishnaa sae humein....door.....door......door lae jaatae hein......un raahon par jahaan sae lautnae kaa raastaa hum nahin jaantae !!!.....Shakuntala kee sampoorna aastha kee tarah hum uss abhigyaan ko jeetae hein ....prem mein ....smarpan mein !!!

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  4. अर्चि दी ,आपने कितनी सुन्दर व्याख्या की है मेरी रचना की ,कि,मैं स्वयं आपके शब्दों के सुन्दर बिम्बों,सुकुमार भाषा प्रवाह और सौम्य भाव शैली से मंत्र-मुग्ध हो कर रह गयी हूँ .हमारा जो ये ह्रदय है इससे बड़ा छली कोई दूसरा नहीं........जिससे बंधता है उसके झूठ,धोखे सब विस्मृत कर देने को सदैव आतुर रहता है.......इस आशा के साथ कि शायद ,यह आखिरी हो जबकि वह स्वयं भी इस तथ्य को जानता है कि ऐसा कुछ नहीं होगा ............

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  5. निधि
    आपके शब्दों का तारतम्य अद्वितीय है ...
    मानवीय भावनाओं के अनुपम चित्रण आपकी इस कविता में स्पष्ट झलकता है..
    .....
    ग़ालिब का शेर याद आता है ...
    कि तेरे वादे पर जीये हम तो जान झूठ जाना
    ख़ुशी से मर न जाते गर एतबार होता
    .......
    किसी ने कहा है कि
    उनके 'अहद-ए-वफ़ा' को मैं अहद क्या समझूं
    मुझे खुद अपनी मोहब्बत पर एतबार नहीं

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  6. कुछ वादे सच्चे हो भी झूठे लगते हैं ओर कुछ झूठे भी सच्चे..

    अच्छे लगे ये वादे..!

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    1. अच्छे लगने भी चाहिए...वादे.

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टिप्पणिओं के इंतज़ार में ..................

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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