मेरे मन के सावन को
मैं अक्सर रोक लेती हूँ
अपने ही भीतर.
बंद कर देती हूँ
आँखों के पट
आंसुओं को समेट के .
मार देती हूँ कुण्डी
मुंह पे ,सिसकियों को उनमें भर के .
साथ ही साथ ..
नहीं भूलती
लगाना ताला
अपने गले पे
सारी चीखें और रुंधा हुआ सब
कहीं गहरे ही दफना के .
कितना भी रोक लूँ
सावन रुकेगा क्या
मेरे रोके जाने से ..
लो,
आ ही गया सावन झूम के
manbhavan sawan....khubsurat rachna....
ReplyDeleteआभार!!
Deleteआपकी रचना कल बुधवार [24-07-2013] को
ReplyDeleteब्लॉग प्रसारण पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
सादर
सरिता भाटिया
रचना को शामिल करने हेतु,धन्यवाद!
Deleteवाह बहुत खूब ....इस बार सावन भी झूम-झूम के आया है
ReplyDeleteसावन का मौसम हो ..झूम के ना आये...तो,आनंद कहाँ
Deleteसुन्दर प्रस्तुति ....!!
ReplyDeleteआपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (24-07-2013) को में” “चर्चा मंच-अंकः1316” (गौशाला में लीद) पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत-बहुत आभार आपका.
Deleteबहुत सुंदर,
ReplyDeleteअच्छी रचना
मुझे लगता है कि राजनीति से जुड़ी दो बातें आपको जाननी जरूरी है।
"आधा सच " ब्लाग पर BJP के लिए खतरा बन रहे आडवाणी !
http://aadhasachonline.blogspot.in/2013/07/bjp.html?showComment=1374596042756#c7527682429187200337
और हमारे दूसरे ब्लाग रोजनामचा पर बुरे फस गए बेचारे राहुल !
http://dailyreportsonline.blogspot.in/2013/07/blog-post.html
थैंक्स!
Deleteसावक को तो आना ही है .. और वो किसी न किसी बहाने आ ही जाएगा ...
ReplyDeleteकुछ पल ही बाँधना आसां है ... भाव मय ...
तहे दिल से शुक्रिया,आपका.
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