कितनी ही रातें गुजरी
आँखों आँखों में
तेरी आमद के सारे रस्ते धोये
आँखों की बरसातों ने.
तुम तो "आता हूँ "
कह कर भूल गए
वाकिफ भी नहीं ...
किसी की दुनिया और वक़्त रुका हुआ है
तुम्हारे इंतज़ार में .
तुम वहाँ अपने हाथ उठाओ
मैं अपनी हथेली आगे बढाती हूँ
जोड़ कर दोनों हथेलियाँ
करते हैं दुआ".....
......ऐ खुदा !
सुन ले ज़रा ....!!"
मांग लेते हैं
एक दूजे को
एक दूजे के लिए .
लकीरें मिले ना मिलें
हम दोनों मिलें
साथ साथ रहें
......हमेशा.
(प्रकाशित)