ज़िन्दगी एक किताब सी है,जिसमें ढेरों किस्से-कहानियां हैं ............. इस किताब के कुछ पन्ने आंसुओं से भीगे हैं तो कुछ में,ख़ुशी मुस्कुराती है. ............प्यार है,गुस्सा है ,रूठना-मनाना है ,सुख-दुःख हैं,ख्वाब हैं,हकीकत भी है ...............हम सबके जीवन की किताब के पन्नों पर लिखी कुछ अनछुई इबारतों को पढने और अनकहे पहलुओं को समझने की एक कोशिश है ...............ज़िन्दगीनामा
Saturday, September 28, 2013
यूँ धोखा नहीं देता
अपने को हंसी में छिपा दर्द का तोहफा नहीं देता
तुम मिल जाते तो मैं खुद को यूँ धोखा नहीं देता
जितनी बार कोई मेरे क़रीब आया बिछड़ गया
क्यूँ ख़ुदा मेरे हक़ में कभी फैसला नहीं देता
हर शख्स़ चाहता है अब एक तजुरबेकार आदमी
इसलिए ही नए को कोई भी मौक़ा नही देता
मैंने जितना चाहा गर वो उतना ही चाहता मुझे
तो यकीनन जो उसने दिया वो फासला नहीं देता
नेता रोज ढूँढ़ते रहते हैं कुछ अलग बात कहने को
पर आजकल देश उन्हें कोई नया मसला नहीं देता
कहता रहता है मुझसे कि मेरी तरक्की चाहता है
पर न जाने क्यूँ आगे बढ़ने को रास्ता नहीं देता
Labels:
तजुर्बेकार,
तरक्की हक़,
दर्द,
धोखा,
फासला,
बिछड,
मसला,
मौक़ा,
रास्ता,
हंसी
Thursday, September 26, 2013
......नहीं है
तमाम उमर मुहब्बत का नशा उतरता नहीं है
मुश्किल बस इतनी कि आसानी से चढता नहीं है
दो चार सच्चे यार दोस्त जिसके आस पास रहें
कितना भी बुरा वक्त आये वो बिखरता नहीं है
हमारे रास्ते जुदा हुए बरसों बरस गुज़र गए
बाक़ी रह गया है कुछ जो कभी ढलता नहीं है
दरक जाता है बरसों का यकीं इक झूठी बात पे
इस शज़र की खासियत दोबारा पनपता नहीं है
गैरों की कमियां गिनाते हुए जुबां नहीं थकती
अपना ऐब पर क्यूँ आँखों में खटकता नहीं है
अपनी काबिलियत का वो इश्तिहार नहीं करता
खरी बात ये भरा जो घड़ा वो छलकता नहीं है
मिल जाएँ हम या हो जाएँ एक दूजे से जुदा
प्यार होता है तो रहता है कभी मरता नहीं है
हादसे के बाद वापस ढर्रे पे आ गयी है ज़िंदगी
बस बच्ची का बचपन अब ढूंढे मिलता नहीं है
Tuesday, September 24, 2013
ऐसा कर दूँ
उदासी
सर्द है और साथ ही बहुत स्याह .
छोटे छोटे कांटे निकले हैं इसमें
जो तुम्हें चुभते हैं और उसको भी
जो तुम्हारे करीब आना चाहता है .
बहुत नुकीले कोने हैं
तुम्हारी इस चुप्पी के
लगातार ,जिनसे रिसता रहता
बूंद-बूंद दर्द ....चुप-चाप .
एक जो खालीपन सा भर रखा है
तुमने अपने भीतर
वो बहुत आवाज़ करता है ,अक्सर
सिसकियाँ की शक्ल में रात भर.
तुम्हारी ख़ामोशी ....
ख़ामोश होकर भी
कभी ख़ामोश नहीं होती
कितने सवाल करती है
कितने जवाब देती है .
मन होता है कि सुन सकूँ...
तुम्हारी चुप्पियों को .
काश,मैं पढ़ सकूँ
तुम्हारी इन खामोशियों को .
सहला सकूँ तुम्हारी उदासियों को ,
निकाल फेंकू सारे कांटे और
भर दूँ प्यार से तुम्हारा रीता मन .
रेत दूँ सारे पैने कोने ,
समतल और चिकना कर दूँ ,
वो सब कुछ.....
..........जो है खुरदुरा ,
तुम्हारे जीवन मे .
Tuesday, August 13, 2013
करते हैं दुआ
कितनी ही रातें गुजरी
आँखों आँखों में
तेरी आमद के सारे रस्ते धोये
आँखों की बरसातों ने.
तुम तो "आता हूँ "
कह कर भूल गए
वाकिफ भी नहीं ...
किसी की दुनिया और वक़्त रुका हुआ है
तुम्हारे इंतज़ार में .
तुम वहाँ अपने हाथ उठाओ
मैं अपनी हथेली आगे बढाती हूँ
जोड़ कर दोनों हथेलियाँ
करते हैं दुआ".....
......ऐ खुदा !
सुन ले ज़रा ....!!"
मांग लेते हैं
एक दूजे को
एक दूजे के लिए .
लकीरें मिले ना मिलें
हम दोनों मिलें
साथ साथ रहें
......हमेशा.
(प्रकाशित)
Tuesday, July 23, 2013
सावन झूम के
मेरे मन के सावन को
मैं अक्सर रोक लेती हूँ
अपने ही भीतर.
बंद कर देती हूँ
आँखों के पट
आंसुओं को समेट के .
मार देती हूँ कुण्डी
मुंह पे ,सिसकियों को उनमें भर के .
साथ ही साथ ..
नहीं भूलती
लगाना ताला
अपने गले पे
सारी चीखें और रुंधा हुआ सब
कहीं गहरे ही दफना के .
कितना भी रोक लूँ
सावन रुकेगा क्या
मेरे रोके जाने से ..
लो,
आ ही गया सावन झूम के
Tuesday, July 16, 2013
शहर में रहा करो

तुम साथ नहीं
तुम पास नहीं
पर,शहर में हो
यह बात भी तसल्ली देती है.
जब सुन लेती हूँ ख़बर
तुम्हारे कहीं जाने की
अजीब सी हालत होती है मेरे मन की...
बड़ा उचाट सा रहता है
वापसी की बाट जोहता है.
मेरे शहर की वो हवा
जो तुम्हें छू कर गुज़रती है
उसे साँसों में भर लेने से
तेरे करीब होने का एहसास जग जाता है.
शहर में तेरी नामौजूदगी से
जीवन ठहर जाता है
सब कुछ थम जाता है .
इसलिए,सुनो मेरी कही यह बात
प्लीजज्ज जहां के हो वहीं आ जाओ,वापस.
Thursday, June 27, 2013
जेठ-आषाढ़
जेठ की तपती दुपहरी थी
गरम साँसों के बीच
लू भी जी जलाती थी.
तब...एकाएक
उसने कहा कि
वो दूर जाने वाला है
कुछ दिन का विरह
बीच में आने वाला है .
मैंने कहा,बता कर जाना
उसका कहना कि
मुझसे कहे बिना क्या
संभव होगा उसका जा पाना ?
वो गया ...
जब चला गया...
दुनिया ने बताया
जब लौटा ..तब भी....
जग ने ही खबर दी
उसकी वापसी की
बताने की ज़रूरत उसे
महसूस ही नहीं हुई .
उसकी ज़िंदगी वैसे ही
मेरे बिन भी चलती रही .
बड़े दिन बाद
एक दिन बात हुई
शिकवे हुए शिकायत हुई
पर,
उसकी आवाज़ की ठंडक
कलेजे के खून को जमा गयी
आषाढ़ के महीने में भी
रिश्तों में से गर्माहट
न जाने कहाँ गयी .
Subscribe to:
Posts (Atom)
