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Thursday, June 27, 2013

जेठ-आषाढ़


जेठ की तपती दुपहरी थी
गरम साँसों के बीच
लू भी जी जलाती थी.
तब...एकाएक
उसने कहा कि
वो दूर जाने वाला है
कुछ दिन का विरह
बीच में आने वाला है .

मैंने कहा,बता कर जाना
उसका कहना कि
मुझसे कहे बिना क्या
संभव होगा उसका जा पाना ?

वो गया ...
जब चला गया...
दुनिया ने बताया
जब लौटा ..तब भी....
जग ने ही खबर दी
उसकी वापसी की
बताने की ज़रूरत उसे
महसूस ही नहीं हुई .
उसकी ज़िंदगी वैसे ही
मेरे बिन भी चलती रही .

बड़े दिन बाद
एक दिन बात हुई
शिकवे हुए शिकायत हुई
पर,
उसकी आवाज़ की ठंडक
कलेजे के खून को जमा गयी
आषाढ़ के महीने में भी
रिश्तों में से गर्माहट
न जाने कहाँ गयी .

Sunday, June 3, 2012

ज़िंदगी हैइच ऎसी.....




ज़िंदगी हैइच ऎसी.....
कब रंग बदल के
सामने आ खडी हो
किसी को पता नहीं होता .
सब सही चल रहा होता है
कि अचानक फोटू बदल जाती है
हाय ये जिंदगी
कहाँ ,किस कोने ,कुब्जे में ले जा के
पटखनी दे अंदाज़ा नहीं होता .

अक्सर,जब हारने लगते हैं
तो कहीं से चली आती है
कि ले थाम हाथ मेरा
अभी से कैसे हार मानने लगे
अभी तो लड़ना बाक़ी है,दोस्त.

हँसते हुए को रुलाने
रोते हुए को हँसाने
आ धमकती है
कभी इस मोड से ...कभी उस मोड पे.
मुझे कल मिली थी ,एक गली में
मुंह चिढाते हुए
कि आ जा...मस्ती करते हैं.कुछ देर.

जाते हुए गले लगा के
कान में कह कर गयी
अपने धमकाने के अंदाज़ में ....
बच्चू ...बच के रहने का
संभल के चलने का,अपुन से...
"

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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