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Wednesday, August 26, 2015

तोहफे

तुम्हारी दी हुई चीज़ जब
दरकती टूटती ..
अटकती बिगड़ती ..
फिसलती छिटकती है
तो ,पता नहीं क्यों
उसे हमारे रिश्ते से जोड़ के
देखने लग जाती हूँ
इतना कुछ खो चुकी हूँ पहले
कि अब कुछ भी खोने से डरती हूँ

तुमने जो कुछ मुझे दिया है
फिर वो चाहें
मोहब्बत का एहसास हो
या ये भरोसा कि तुम पास हो
कई ख़त दुआओं से भरे हुए
या छोटे बड़े अनगिन तोहफे
अब  ,
जब कभी इनमें से
किसी को कुछ होता है
इक डर सताता है मुझे
सब बिखर जाने का

उसके बाद अक्सर मनाती रहती हूँ
मुहब्बत का कभी एक लम्हा न छूटे
तेरे प्यार पे जो है भरोसा वो न टूटे
दुआओं के ख़त में न देर हो कभी
चाहत का रंग फीका न पड़े कभी

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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