सच कहना रुकता है क्या ...कुछ
किसी के होने से या न होने से .
कहीं कुछ नहीं थमता
वैसे ही है चलता रहता
अच्छा है जितनी जल्दी
आ जाएँ बाहर ...इस गफलत से
कि फर्क पड़ता है किसी को
हमारे होने या न होने से
साथ जीने मरने की कसमें खाना ...
....अलग बात है
या कह लो सिर्फ बात है.
साथ साथ लोग जी सकते हैं
साथ मरते भई मैंने तो किसी को नहीं देखा.



