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Sunday, December 9, 2012

सच कहना




सच कहना रुकता है क्या ...कुछ
किसी के होने से या न होने से .

कहीं कुछ नहीं थमता
वैसे ही है चलता रहता
अच्छा है जितनी जल्दी
आ जाएँ बाहर ...इस गफलत से
कि फर्क पड़ता है किसी को
हमारे होने या न होने से

साथ जीने मरने की कसमें खाना ...
....अलग बात है
या कह लो सिर्फ बात है.

साथ साथ लोग जी सकते हैं
साथ मरते भई मैंने तो किसी को नहीं देखा.

Tuesday, July 24, 2012

क्या.....




बेजान चीज़ों को
जला कर
तोड़ कर
धो कर
फाड़ कर
फेंक कर
तुमने सोचा होगा
कि चलो,पीछा छुडा लोगे ,मुझसे .
सच कहना
कि क्या .........
जला पाओगे?
तोड़ पाओगे ?
मिटा पाओगे?
धो पाओगे?
फाड़ पाओगे ?
फेंक पाओगे?

मेरा अक्स ...
अपने दिल से
अपने ख़्वाबों से
अपनी सुबहों से
अपनी आँखों से
अपनी यादों से
अपनी बातों से
अपनी रातों से
अपने"वजूद" से .

तुम्हें अभी तक दरअसल पता ही नहीं चला है
कि फर्क नहीं है कोई "मैं" और "तुम" में
जब तक तुम हो
मैं रहूंगी तुम में .

Friday, December 2, 2011

हरसिंगार




मैं,
आजकल............
रातों में ,
सोती नहीं हूँ .
तुम्हारे साथ ,तुम्हारे पास होती हूँ.
तुम्हें,पता है,न !
रात भर मिल कर......
हम ढेरों बातें करते हैं ...

सारी रात .....
सांसें चढती हैं,
धडकनें बढ़ती हैं .
हरसिंगार की कलियों को
जैसे फूलों में बदलते हैं .

सवेरा होते ही
बिस्तर छोड़ देती हूँ
देखती हूँ कि
तुम पास नहीं हो
नारंगी डंठल वाले
वो सफ़ेद फूल
ज़मीं पर बिखरे पड़े हैं
और ...मेरा बदन
खुशबू से महक रहा है .

Monday, November 7, 2011

बातें जो खत्म नहीं होतीं



आओ ...
एक बार फिर....
सारी रात गुज़ारे ...साथ -साथ
वक्त गुजरने का पता न चले..

ओस की बूंदों से अंजुरी भरें
भोर की पहली किरण हँसे
और कहे...
अभी भी जाग रहे हो...तुम दोनों
सोना नहीं है क्या ?
ऐसी कौन सी बातें हैं
जो कभी खत्म ही नहीं होती .

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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