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Wednesday, August 15, 2012

आज़ादी दिवस



एक पागल है ..
सारे शहर में घूम घूम के
हरसिंगार के झरे फूल और गिरी पत्तियां
इकट्ठी करता है .

सुना है...
वक्त का है मारा
फ़ौजी है पुराना
इन फूल पत्तियों में
उसे...



अपना तिरंगा नज़र आता है .
जिससे हर शख्स बेखबर नज़र आता है .
अपने देश की स्थिति दिखायी देती है .
बात-बात पे उसकी आँख भर आती है .

देश के लिए कुछ करने..देश को कुछ दे पाने का पागलपन हम पे भी हावी हो जाए .
आज़ादी दिवस आप सभी को मुबारक हो !!

Friday, December 2, 2011

हरसिंगार




मैं,
आजकल............
रातों में ,
सोती नहीं हूँ .
तुम्हारे साथ ,तुम्हारे पास होती हूँ.
तुम्हें,पता है,न !
रात भर मिल कर......
हम ढेरों बातें करते हैं ...

सारी रात .....
सांसें चढती हैं,
धडकनें बढ़ती हैं .
हरसिंगार की कलियों को
जैसे फूलों में बदलते हैं .

सवेरा होते ही
बिस्तर छोड़ देती हूँ
देखती हूँ कि
तुम पास नहीं हो
नारंगी डंठल वाले
वो सफ़ेद फूल
ज़मीं पर बिखरे पड़े हैं
और ...मेरा बदन
खुशबू से महक रहा है .

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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