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Tuesday, July 24, 2012

क्या.....




बेजान चीज़ों को
जला कर
तोड़ कर
धो कर
फाड़ कर
फेंक कर
तुमने सोचा होगा
कि चलो,पीछा छुडा लोगे ,मुझसे .
सच कहना
कि क्या .........
जला पाओगे?
तोड़ पाओगे ?
मिटा पाओगे?
धो पाओगे?
फाड़ पाओगे ?
फेंक पाओगे?

मेरा अक्स ...
अपने दिल से
अपने ख़्वाबों से
अपनी सुबहों से
अपनी आँखों से
अपनी यादों से
अपनी बातों से
अपनी रातों से
अपने"वजूद" से .

तुम्हें अभी तक दरअसल पता ही नहीं चला है
कि फर्क नहीं है कोई "मैं" और "तुम" में
जब तक तुम हो
मैं रहूंगी तुम में .

Saturday, August 27, 2011

किसी को मरते नहीं देखा...


जब... मैंने,आज तुमसे कहा
कि ,मैंने आज तलक
किसी को मरते नहीं देखा .
तुम खूब हँसे थे ,मुझ पर.
कहने लगे..यह संभव ही नहीं .
तुम्हारे.....
इस असंभव और हँसी के मर्म को ढूंढती रही .
उस हँसी की गूँज सुनती रही...सोचती रही
तो यह लगने लगा
कि सच कहा ,तुमने
क्यूंकि
भले मैंने किसी इंसान को दम तोड़ते ना देखा हो
पर............
खुद को खुद के अंदर कई बार मरा पाया है
अपने सपनों का तो खुद गला घोंट डाला है
अपने प्यार को दिल में ही दफनाया है
उम्मीदों को बेमौत मैंने ही मार डाला है
मैंने कैसे कह दिया
कि मैंने मौत नहीं देखी ..
आप सभी ने देखी होगी ...
जब अपने ख़्वाबों ...अपने मूल्यों
अपने आदर्शों,अपनी चाहतों ...
की अर्थी सजाई होगी .

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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