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Thursday, August 27, 2015

यायावर

यायावर हूँ
घुमक्कड़ी...काम मेरा
बेमतलब इधर उधर भटकते रहना
बिन काम के यहाँ वहाँ फिरते रहना
तेरे दिल के सिवा न घर न मकाँ मेरा

तुमसे छूटा तो फिर कहीं बंध न सका
ज़िन्दगी में इक ठौर कभी रुक न सका
भागता रहा हमेशा कहीं थम न सका
कोई चीज़ कोई बंधन मुझे कस न सका

प्यार खोया और मैं उसे ढूंढता रह गया
वो ख़त हूँ जिसका पता लापता हो गया
क्या करता यार
तेरे प्यार में पागल हुआ आवारा हो गया
तेरे दिल से निकला तो मैं बंजारा हो गया

Friday, September 16, 2011

तुमसे मिल भी नहीं पाती ..


मन करता है ....
तुमसे मिलूँ ,ढेरों बातें करूँ
पर,फिर.........
ज़माने का डर
रोक लेता है मुझे .

इस भय को जो किसी तरह
मैं पार कर लेती हूँ ..
तो,मेरे कदम रोक लेती है
मेरी शर्म,मेरी ही हया
उसपे संस्कारों की बाधा

इतने तो बंधन हैं आज भी ..
फिर क्यूँ सब कहते हैं
कि वक्त बदल गया है.
स्वतंत्र है नारी ,
हर काम कि उसे है आजादी .
जबकि मैं तो बिना भय के
तुमसे मिल भी नहीं पाती
हरदम यही खटका
कि किसी ने देख लिया तो क्या होगा
बिना किसी अपराधबोध के
तुमसे प्यार भी नहीं कर पाती हूँ .

सुराग.....

मेरी राह के हमसफ़र ....

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